हिंदू पंचांग के मुताबिक, हर महीने कृष्‍ण पक्ष और शुक्‍ल पक्ष दोनों की मिलाकर 2 चतुर्थी पड़ती हैं। चतुर्थी तिथि पर विशेष रूप से गणेशजी की पूजा का महत्‍व होता है। जब यह चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है तो अंगारकी चतुर्थी कहलाती है। मान्‍यता है कि अंगारकी चतुर्थी का व्रत करने से पूरे साल भर के चतुर्थी व्रत रखने का फल प्राप्‍त होता है।



अंगारकी चतुर्थी के महत्‍व और पूजाविधि

एक बार मंगलदेवता ने भगवान गणेश को प्रसन्‍न करने के लिए कड़ी तपस्‍या करने का प्रण लिया। उनकी इस तपस्‍या को देखकर गणेशजी प्रकट हुए और उन्‍होंने मंगलदेवता को वरदान दिया कि मंगलवार के दिन जो भी चतुर्थी पड़ेगी, उसे अंगाकरी चतुर्थी के नाम से जाना जाएगा। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य के सभी कार्यों में आ रही विघ्‍न और बाधाएं दूर हो जाएंगी। इस व्रत को करने वाले की कुंडली से मंगल दोषों का भी निवारण होगा।

इस बार अंगारकी चतुर्थी आज यानी मंगलवार को प्रात: 8 बजकर 22 से आरंभ हुई है और उससे पहले तक तृतीया तिथि थी और चतुर्थी बुधवार तक 10 बजकर 46 मिनट तक है। इस कारण से इसका मान बुधवार को भी रहेगा। तो व्रती को मंगल के साथ ही बुध दोष से भी मुक्ति मिलेगी।

  • अंगारकी चतुर्थी पर व्रत रखें। इस दिन सूर्योदय से पहले जगकर स्नान आदि से निवृत हो जाए। भगवान गणेश की पूजा के लिए धूप-दीप, पुष्प, दुर्वा और यथा संभव मेवा अर्पित करें और मोदक का भोग लगाएं।
  • इस दिन शाम की पूजा चांद निकलने से पहले करनी चाहिए। पूजा के दौरान तिल और गुड़ के लड्डू, फूल, जल, चंदन, दीप-धूप, केला और मौसमी फल, नारियल आदि प्रसाद के तौर पर रखें।
  • पूजा करते वक्त दुर्गा माता की मूर्ति भी रखें। गणपति पूजा के दौरान माता की मूर्ति रखना शुभ माना जाता है। गणेशजी की आरती के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती करनी चाहिए।
  • गणपति को चंदन का टीका लगाने के बाद धूप-दीप से वंदन करना चाहिए। उसके बाद लड्डुओं का भोग लगाकर प्रसाद बांटना चाहिए।

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