मेघालय में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। ऐसे में वहां सियासी हलचल बढ़ गई है। भाजपा, कांग्रेस और एनपीपी के नेताओं ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। भाजपा ने मेघालय में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए.संगमा (दिवंगत)की पार्टी एनपीपी से बातचीत शुरू कर दी है। चर्चा है कि नतीजे साफ होने के बाद भाजपा और एनपीपी हाथ मिला सकती है।

उधर कांग्रेस के अहम रणनीतिकार और सोनिया गांधी के भरोसेमंद अहमद पटेल दो अन्य बड़े नेताओं के साथ मेघालय के लिए रवाना हो चुके हैं। मेघालय में पिछले 9 साल से कांग्रेस की ही सरकार है। ऐसे में इस किले को बचाने के लिए कांग्रेस हरसंभव जतन कर रही है। सियासी पंडितों का भी मानना है कि मेघालय में कांग्रेस के सामने किला बचाने की चुनौती है। अगर मेघालय में कांग्रेस हार गई तो पूरे देश में संदेश जाएगा कि एक और राज्य से पार्टी समाप्त हो गई और भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत के अपने नारे को और मजबूती से पेश करेगी। ऐसे में 2019 से पहले अपनी संभावनाओं को खुला रखने के लिए कांग्रेस पर इस राज्य में बेहतर प्रदर्शन का करने का दबाव है।

कांग्रेस को यहां बागी गुट के अलावा तमाम छोटे छोटे दलों से चुनौती मिल रही है, जिनके साथ भाजपा चुनाव बाद सरकार बनाने की जुगत में है। बता दें कि मेघालय में विधानसभा की कुल 60 सीटें हैं। 27 फरवरी को 59 सीटों पर वोटिंग हुई थी। विलियमनगर सीट पर एनसीपी के उम्मीदवाल जोनोथॉन संगमा की आईईडी ब्लास्ट में मौत के बाद यहां चुनाव स्थगित कर दिया गया था। मेघालय में किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए 31 सीटों पर जीत जरूरी है।

मेघालय में अगर कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो उसका हाल वैसा ही होगा जैसा मणिपुर में हुआ था। मणिपुर के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 28 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी फिर भी वह सरकार नहीं बना पाई। 21 सीटें जीतने वाले भाजपा ने एनपीपी व अन्य दलों के समर्थन से एन.बीरेन सिंह के नेतृत्व में सरकार बना ली। आपको बता दें कि एनपीपी एनडीए की घटक दल है। वह मणिपुर में भाजपा के साथ सरकार में शामिल है। ऐसे में मेघालय में भाजपा और एनपीपी निर्दलीयों का समर्थन लेकर आसानी से सरकार बना सकती है।