मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोर्ट ने कई तरह के निमय और कानून बनाए हैं। तीन तलाक को लेकर कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। साथ ही यह मुद्दा सुलझा ही था कि मुस्लिम महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तलाक-ए-हसन का मुद्दा पेश किया है। याचिका में दावा किया गया है कि तलाक के यह प्रकार मनमाना, तर्कहीन और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

यह भी पढ़ें- मिजोरम मारा स्वायत्त जिला परिषद 5 मई को कराएगी चुनाव, 80 उम्मीदवार चुनाव प्रचार के तैयार
गाजियाबाद निवासी बेनजीर हिना द्वारा दायर याचिका में केन्द्र को सभी नागरिकों के लिए तलाक के समान आधार और प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि वह ''एकतरफा न्यायेतर ''तलाक-ए-हसन'' का शिकार हुई है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पुलिस और अधिकारियों ने उसे बताया कि शरीयत के तहत ''तलाक-ए-हसन'' की अनुमति है।

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर 'तलाक-ए-हसन' और "एकतरफा अतिरिक्त न्यायिक तलाक" के अन्य सभी रूपों को खत्म करने और असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।  याचिका में दावा किया गया है कि 'तलाक-ए-हसन' और इस तरह की अन्य एकतरफा न्यायेतर तलाक प्रक्रियाएं मनमानीपूर्ण और अतर्कसंगत हैं तथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।


क्या है 'तलाक-ए-हसन'?


'तलाक-ए-हसन' में, तीन महीने की अवधि में महीने में एक बार 'तलाक' कहा जाता है। तीसरे महीने में तीसरी बार 'तलाक' कहने के बाद तलाक को औपचारिक रूप दिया जाता है। याचिका में अनुरोध किया गया है कि उच्चतम न्यायालय तलाक-ए-हसन और न्यायेतर तलाक के अन्य रूपों को असंवैधानिक करार दे।     


3 तलाक कानून क्या है?


पहले तीन तलाक के तहत कोई पति अपनी पत्नी को तीन बार तलाक बोल कर छोड़ देता था। लेकिन अब यह गैरकानूनी है। तीन तलाक कानून के अंतर्गत अगर कोई पति अपनी पत्नी को तीन बार तलाक बोल कर छोड़ देता है तो उसे कानूनन तीन साल की सजा हो सकती है और पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है।