एसटी का दर्जा देने व 2012 में संघर्ष विराम की घोषणा करने वाले पांच उग्रवादी समूहों से संवाद की मांग को लेकर 17 आदिवासी संगठनों के सदस्यों ने बुधवार को असम के कुछ जगहों पर  राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम कर दिया। आदिवासी नेशनल कन्वेंशन के बैनर तले संगठनों के सदस्यों ने सुबह 7 बजे से 12 बजे तक कोकराझार के करियागांव व पदमाबील, धुबरी में बोहोलपुर, चिरांग में समथाईबारी, बक्सा में कोदोमताल, उदलगिरी में ओरांग व सोनितपुर जिलों में राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम करके रखा। प्रदर्शनकारियों ने अपनी विभिन्न मांगों को करने की मांग को लेकर नारेबाजी की। जब तक आंदोलनकारियों ने खोला नहीं तब तक कोकराझार व धुबरी के जरिए पास होने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 31ए, व राष्ट्रीय राजमार्ग 31सी पर कई ट्रक फंसे रहे। डिप्टी कमिश्नर्स के जरिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ज्ञापन सौंपा गया।

इसमें मांग की है कि उन्होंने आदिवासी बुलाया जाए न कि टी ट्राइब कम्यूनिटी। साथ ही ट्रेडिशनल फॉरेस्ट ड्वेलर्स(रिकॉगनिशन ऑफ फोरेस्ट राइट्स)एक्ट 2006 के तहत फोरेस्ट एरियाज में रह रहे लोगों को जमीन के अधिकार दिए जाए। उनकी अन्य महत्वपूर्ण मांग है कि चाय बागानों के भूमिहीन मजदूरों को जमीन के पट्टे दिए जाए। असम में करीब 80 लाख आदिवासी हैं। कन्वेंशन के सचिव बिरसिंग मुंडा ने रविवार को कहा, आदिवासियों का हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ा योगदान रहा है लेकिन केन्द्र व असम सरकार ने हमारी समस्याओं के हल की कभी परवाह नहीं की। सरकार एसटी का दर्जा देने की प्रक्रिया में देरी कर रही है। साथ ही उग्रवादी समूहों की ओर से उठाए गए मसलों के हल में भी देरी हो रही है। 2012 में केन्द्र की अपील पर पांच उग्रवादी संगठनों ने हथियार डाले थे।

इस साल 24 अप्रेल को राजनीतिक स्तर पर हमारे साथ वार्ता का सिर्फ एक दौर हुआ लेकिन एसटी के दर्जे पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका। साथ ही संघर्ष विराम करने वाले पांच समूहों के 1200 सदस्यों से ज्यादा सदस्यों के पुनर्वास पर भी फैसला नहीं हो पाया। मुंडा संघर्ष विराम में शामिल आदिवासी संगठन बिरसा कमांडो फोर्स के कमांडर इन चीफ थे। जिन पांच उग्रवादी संगठनों ने संघर्ष विराम की घोषणा की थी उनमें आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम, आदिवासी पीपुल्स आर्मी, ऑल आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी और संथाल टाइगर फोर्स शामिल है। मुंडा ने कहा, प्रत्येक चुनाव से पहले राजनीतिक दल हमें एसटी का दर्जा देने का वादा करते हैं क्योंकि 80 लाख आदिवासी कई निर्वाचन क्षेत्रों में डिसाइडिंग फैक्टर्स है लेकिन चुनाव जीतने के बाद वे हमें भूल जाते हैं। भाजपा ने भी 2014 के लोकसभा चुनाव व 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले एसटी का दर्जा देने का वादा किया था लेकिन हमारी मांगे अभी तक पूरी नहीं हो पाई। चाय बागानों के वर्कर्स को 137 रुपए दिहाड़ी मिलती है। उनके पास जमीन के अधिकार नहीं है। जो लोग फॉरेस्ट एरियाज में रह रहे हैं, उन्हें अक्सर वहां से भगा दिया जाता है और वे अन्य उग्रवादी संगठनों के सॉफ्ट टारगेट हो जाते हैं।