जूतों की दुनिया में आज से करीब एक सदी पहले एक बड़ी क्रांति हुई थी। इस क्रांति का पूरा श्रेय डसलर भाइयों को जाता है। इन्होंने एथलीट्स को एक ऐसा जूता दिया, जिनसे उनकी परफॉर्मेंस बढ़ गई। यहां बात हो रही है एडिडास की, जिसका नाम हर खेल में आपको देखने को जरूरत मिलेगा और अधिकतर खिलाड़ियों के पैरों में इसके जूते भी दिखेंगे। आज एडिडास की बात इसलिए हो रही है, क्योंकि इसने स्पोर्ट्स ब्रांड रीबॉक को करीब 2.5 अरब डॉलर में बेचने की पूरी तैयारी कर ली है। करीब 16 साल पहले 2005 में कंपनी ने रीबॉक को लगभग 3.8 अरब डॉलर में खरीदा था, लेकिन अब कंपनी को रीबॉक से नुकसान हो रहा है। रीबॉक को अमेरिका की ऑथेंटिकेट ब्रांड्स ग्रुप कंपनी खरीद रही है। एडिडास यूं ही आज इतना लोकप्रिय नहीं हुआ, एडिडास को खड़ा करने में एडोल्फ डसलर ने अपनी पूरी जिंदगी दे दी।

एडिडास के सफर की शुरुआत हुई करीब एक सदी पहले। 1922 में जर्मनी में रहने वाले एडोल्फ डसलर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिता के जूते बनाने के छोटे से बिजनस से जुड़ गए। उस वक्त उनका इलाका Herzogenaurach जूते बनाने वालों का गढ़ बन गया था। इलाके की अधिकतर कपड़े बनाने की फैक्ट्रियों ने जूते बनाने शुरू कर दिए थे। वहां रहने वाले करीब 3500 लोगों के लिए 112 लोग जूते बनाने का काम कर रहे थे। जिंदगी जैसे-तैसे आगे बढ़ ही रही थी कि पहले विश्व युद्ध ने मुसीबतें पैदा कर दीं।

पहले विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा और जूते बनाने वालों की जिंदगी में कई परेशानियां खड़ी हो गईं। गरीबी से जूझ रहे एडोल्फ डसलर अपने लिए काम करने की एक अच्छी सी जगह भी नहीं ले सकते थे तो उन्होंने अपनी मां की लॉन्ड्री के बाथरूम में बैठकर जूते बनाने का काम शुरू किया। तब बिजली की अच्छी व्यवस्था नहीं थी, तो अपने इक्विपमेंट्स को चलाने के लिए रूडोल्फ अक्सर अपनी स्टेशनरी बाइक का इस्तेमाल करते थे। वह उसे पैडल मार-मार कर चलाते हैं, जिससे बिजली पैदा होती थी, जो उनकी मशीनें चलाने के काम आती थी। वह जूते बनाने के लिए युद्ध में इस्तेमाल हुई चीजों का भी इस्तेमाल करने लगे, जिसमें मिलिट्री यूनिफॉर्म, हेलमेट, ऑटोोबाइल टायर, पैराशूट जैसी चीजें शामिल थीं।

एडोल्फ हमेशा से ही एक स्पोर्ट्स फैन थे तो उन्होंने स्पोर्ट्स शूज बनाना शुरू किया। वह हमेशा ही स्पोर्ट्स शूज को बेहतर बनाने के लिए कुछ ना कुछ एक्सपेरिमेंट करते रहते थे। इन्हीं में से एक एक्सपेरिमेंट था जूतों के नीचे मेटल स्पाइक्स लगाने का, जो आज के वक्त में बेहद लोकप्रिय हो चुका है। जुलाई 1924 में एडोल्फ के बड़े भाई रूडोल्फ ने भी बिजनस में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। रूडोल्फ को कई जगह काम करने का एक्सपीरियंस था। ऐसे में एडोल्फ जूते बनाते और रूडोल्फ उनकी मार्केटिंग करते। दोनों ने साथ मिलकर डसलर ब्रदर्स शूज फैक्ट्री शुरू की।

1926 में दोनों इस स्थिति में पहुंच चुके थे कि उन्होंने जूते बनाने के लिए एक डेडिकेटेड वर्कशॉप ले ली। उनके पिता ने भी उनके बिजनस में हिस्सा ले लिया और नई फैक्ट्री में कई लोगों की भर्ती कर ली। अब वह रोजाना 100 से भी अधिक जूते बनाने लगे थे। जब कंपनी बढ़ने लगी तो एडोल्फ ने स्पोर्ट्स इवेंट्स में जाना शुरू कर दिया। यहीं से उनकी किस्मत ने पलटी मारी। 1928 में एम्सटरडैम में ओलंपिक्स हुए, जिसमें बहुत से एथलीट्स ने डसलर ब्रदर्स शूज फैक्ट्री के जूते पहने। 1936 में बर्लिन में हुए ओलंपिक्स में उन्होंने अमेरिका के जेसी ओवेन से डसलर ब्रदर्स शूज फैक्ट्री के जूते पहनने के लिए मना लिया। उस वक्त जेसी ओवेन दुनिया भर में सबसे तेज दौड़ने वाले शख्स थे। उस ओलंपिक में जेसी ने 4 गोल्ड मेडल जीते और देखते ही देखते एडोल्फ के जूतों की मांग आसमान में जा पहुंची।

अभी एडोल्फ की कंपनी ने सफलता की उड़ान शुरू ही की थी कि दूसरा विश्व युद्ध आ गया। 1 सितंबर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया, जब जर्मनी की सेना पोलैंड में जा घुसी। 1943 में जर्मनी हार गया और युद्ध को जारी रखने के लिए उन्हें और अधिक हथियारों की जरूरत थी। ऐसे में जर्मनी की सरकार बहुत सारी फैक्ट्रियों को हथियार बनाने के काम में लगा दिया। डसलर ब्रदर्स शूज फैक्ट्री भी हथियार बनाने लगी। 1945 में अमेरिकी सेना एडोल्फ के गांव Herzogenaurach में आ घुसी और एडोल्फ की फैक्ट्री को नेस्तनाबूत करने का फैसला किया, लेकिन एडोल्फ की पत्नी ने जैसे-तैसे सेना को मनाया कि कंपनी में स्पोर्ट्स शूज बनते हैं। इसके बाद जब अमेरिका के लोगों को पता चला कि एक अमेरिकन एथलीट जेसी ओवन डसलर ब्रदर्स शूज फैक्ट्री के जूते पहनते हैं तो उनके जूतों की मांग बढ़ने लगी। हालांकि, दूसरे विश्व यूद्ध से जर्मनी की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल हो गया। कामगारों को देने के लिए पैसे तक नहीं थे तो उन्हें काम के बदले कपड़े या जलाने की लकड़ियां दी जाने लगीं।

इसी मुसीबत के दिनों में एक और दिक्कत सामने आई और डसलर भाइयों के बीच विवाद हो गया। 1948 में दोनों अलग-अलग हो गए। रूडोल्फ ने कसम खा ली कि वह जिंदगी में कभी एडोल्फ से बात नहीं करेंगे। कामगारों में से अधिकतर को रूडोल्फ अपने साथ ले गए और रुडा (Ruda) नाम से अपनी जूते बनाने की कंपनी शुरू कर दी। हालांकि, बाद में उन्होंने कंपनी का नाम बदलकर पूमा (Puma) कर दिया, क्योंकि Ruda एथलीट्स के हिसाब से ठीक नहीं लगता था। दोनों कंपनियों के ही नहीं, बल्कि उसमें काम करने वाले लोगों के बीच भी दुश्मनी सी हो गई। करीब 60 सालों तक ये दुश्मनी ऐसे ही चलती रही। हर कोई किसी से भी बात करने से पहले ये देखता था कि उसने कौन से जूते पहने हैं, उसी के बाद फैसला करता था कि बात करनी है या नहीं।

1949 में एडोल्फ ने अपनी कंपनी का नाम बदलकर एडिडास कर दिया। एडोल्फ डसलर का सपना था कि दुनिया का हर एथलीट उनकी कंपनी के जूते पहने। वैसे तो ये सपना पूरा नहीं हो सका, लेकिन अधिकतर लोग एडिडास के जूतों में नजर आ जाते हैं। लोग समझते हैं कि एडिडास का मतलब (ADIDS) उनके सपने से ही जुड़ा है। हालांकि, ये उनके नाम से जुड़ा है। एडी उनका पहला नाम और डास उनके उपनाम का शुरुआत। इसके बाद से उनकी कंपनी तेजी से आगे बढ़ती गई और देखते ही देखते दुनिया पर छा गई। कभी बाथरूम से शुरू हुई ये कंपनी आज 72.90 अरब डॉलर यानी करीब 5.41 लाख करोड़ रुपये की बन गई है।