पंजाब विधानसभा चुनाव कई मायनों में ख़ास हैं. कुछ पुराने साथी अलग हो गए हैं, तो कुछ ने नए दोस्तों से हाथ मिला लिया है. 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने कैप्टेन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में राज्य की 117 सीटों में से 77 पर कब्ज़ा कर, अपनी सरकार बनाई थी. वहीं इस बार कैप्टन की नई राजनीतिक पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस, बीजेपी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा की शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी है. वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी से अलग हो चुकी अकाली दल को बहुजन समाज पार्टी का सहारा मिला है. 94 वर्ष के प्रकाश सिंह बदल भी चुनावी रण में अपनी किस्मत आजमाएंगे. ये जोड़ी, दलित वोटरों को साधने की पूरी कोशिश कर रही है. 

जबकि पिछले विधानसभा चुनावों में 20 सीटें अपने नाम कर, मुख्य विरोधी रही, आम आदमी पार्टी को भी इस बार अपने वादों से काफी उम्मीदें हैं. अरविन्द केजरीवाल के खेवनहार रहे भगवंत मान, प्रदेश के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किये गए हैं. केजरीवाल पंजाब के लोगों को मुफ्त बिजली और सभी वयस्क महिलाओं को हर महीने एक हज़ार रूपए देने जैसे वादे कर रहे हैं. वादों और चुनावों के पुराने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर कई नई घोषणाओं के जरिये मतदाताओं को रिझाने की कोशिश की है, हालांकि पार्टी पर अपने पुराने वादे पूरे न करने के इल्जाम अभी भी ताजा ही हैं. 

इन सब के बीच कांग्रेस के साथ एक फायदेमंद बात यह है कि चुनावों से कुछ महीने पहले ही प्रदेश के मुखिया बने चरणजीत सिंह चन्नी, दलित समुदाय से आते हैं, यह निश्चित रूप से पंजाब में दलितों के उत्थान को दर्शाता है. इसमें एक अच्छी बात ये भी है कि पिछले विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 34 सीटों में से 21 सीटें कांग्रेस पार्टी के हाथ ही लगी थीं. हालांकि नवजोत सिंह सिंधु का पार्टी नेताओं, और खुद चन्नी के साथ रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं, जो इन चुनावों में काफी अहम भूमिका निभाएगा. 

ऐसी अजब सियासी रस्साकसी के बीच आम आदमी पार्टी, पंजाब में बहुत मजबूत संगठन न बना पाने के बावजूद, बड़ा उलटफेर कर सकती है. दिल्ली मॉडल का राग, पंजाब में सुर पकड़ेगा, इसकी उम्मीद जरूर है. पार्टी की कोशिश होगी कि 20 सीटों को 120 में तब्दील किया जाए, इसके लिए अंत में जो भी साम दाम करना पड़े, केजरीवाल उसके लिए भी तैयार होंगे. कई दलों और विरोधियों में बट चुके पंजाब चुनाव में एकतरफा मतों की आंधी शायद ही देखने को मिले. इसलिए मेरा इशारा राज्य में त्रिशंकु सरकार की ओर है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि पंजाब के हिन्दू मतदाताओं को कांग्रेस ने अपने कब्जे में कर रखा है, वहीं चन्नी का दलित वर्ग से आना भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद ही है. दूसरी ओर आम आदमी पार्टी दिल्ली मॉडल के नाम पर कम से कम 40+ सीटें इकठ्ठा करने की कोशिश कर सकती है. वहीं कृषि कानूनों की लड़ाई लड़ चुकी अकाली दल को भी अपने मतदाताओं से भारी उम्मीदें हैं. यदि अकाली दल और बसपा का जादू थोड़ा बहुत भी पंजाब के मतदाताओं पर चला, तो अंत में गठजोड़ की रणनीति काम आ सकती है. 

वैसे भी सुखबीर सिंह बादल ने ये एलान किया है कि अगर शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी तो उसमें दो उप-मुख्यमंत्री होंगे जिनमें से एक दलित होगा और दुसरा पंजाबी हिन्दू. वहीं किसान आंदोलन में शामिल कुल 32 किसान संगठनों में से 22 संगठनों ने संयुक्त समाज मोर्चा नाम की पार्टी भी बना रखी है, जिनकी जरुरत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे में यदि आप को फिर से दूसरी प्रमुख पार्टी बनने का मौका मिला, तो बेशक वह मान को मुख्यमंत्री का ताज जरूर पहनाएगी.