पूर्वोत्तर क्षेत्र के उग्रवादी जो म्यांमार में छिपे हुए हैं, को एनएससीएन(के) के चेयरमैन एसएस खापलांग के निधन के बाद लॉजिस्टिक सहित अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सुरक्षा एजेसियां स्थिति पर करीब से नजर रखे हुए है। समाचार पत्र द असम ट्रिब्यून ने उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से बताया कि एक अनुमान के मुताबिक म्यांमार में छिपे हुए उग्रवादियों की कुल संख्या करीब 2000 हो सकती है। समाचार पत्र के मुताबिक म्यांमार में सबसे ज्यादा एनएससीएन(के) के उग्रवादी छिपे हुए हैं। अनुमान के मुताबिक एनएससीएन(के)के 700 से 800 उग्रवादी म्यांमार में छिपे हुए हैं। इनमें उग्रवादी सगठन से सहानुभूति रखने वाले भी शामिल है। सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम(आई) के उग्रवादियों की संख्या करीब 200 व नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एस) के उग्रवादियों की संख्या 150 के करीब हो सकती है।

म्यांमार में मणिपुर बेस्ड संगठनों की भी काफी बड़ी स्ट्रेंथ है। सूत्रों के मुताबिक खापलांग म्यांमार से ताल्लुक रखते थे, उनका इलाके पर होल्ड था और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे कई नगा ग्रामीण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एनएससीएन(के) का समर्थन करते हैं। क्षेत्र के ज्यादातर उग्रवादी संगठन म्यांमार में एनएससीएन की सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं। दरअसल नॉर्थ ईस्ट के उग्रवादियों को भारत में प्रवेश के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा के दूसरी तरफ ग्राम प्रधानों की ओर से जारी किए जाने वाले पास लेने होते हैं और ये सिस्टम कुछ समय से चल रहा है लेकिन खापलांग के निधन के बाद खांगो कोन्याक एनएससीएन(के) के चेयरमैन बने और वह मूलत: भारत से है। इस कारण संदेह है कि कोन्याक नगा बहुल गावों पर उसी तरह का होल्ड रख पाए है या नहीं। ये नगा गाव अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास स्थित है। अगर कोन्याक उन इलाकों पर होल्ड रखने में विफल रहे हैं तो नॉर्थ ईस्ट के सभी उग्रवादी संगठनों को लॉजिस्टिक प्रोबलम्स होगी और नगा बहुल गावों से उनकी मूवमेंट को रोका जा सकता है। यही नहीं खापलांग उन उग्रवादी संगठनों के लिए फादर फिगर जैसे थे,जिनका बेस म्यांमार में है और वह उग्रवादी संगठनों की ओर से गठित अम्ब्रेला ऑर्गेनाइजेशंस के हेड थे। हालांकि उल्फा (आई) का कमांडर इन चीफ परेश बरुआ ने अम्ब्रेला संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ती। उन्हें कॉमन प्लेटफॉर्म में खापलांग का डिप्टी माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक इसमें संदेह है कि सभी उग्रवादी संगठनों ने उसे नेता के रूप में स्वीकार किया है या नहीं। इस बीच सूत्रों ने स्वीकार किया है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर असम राइफल्स की मौजूदगी के बावजूद उग्रवादी संगठन क्षेत्र का फायदा उठाते हुए अभी भी म्यांमार में स्थित अपने ठिकानों से भारत में घुस रहे हैं लेकिन यह तथ्य है कि अरुणाचल प्रदेश के तिराप,चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में उग्रवाद विरोधी अभियानों के कारण उग्रवादियों के लिए बड़े समूहों में भारत में प्रवेश मुश्किल हो गया है।