अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा और हिंदू संगठनों के 13 नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती है। सभी को इस मामले में फिर से आपराधिक साजिश रचने का आरोपी बनाया जा सकता है। मामले पर 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना सकता है।

इस मामले में आरोपियों के खिलाफ ट्रायल में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चिंता जाहिर करते हुए यह संकेत दिए। जस्टिस पीसी घोष और जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच सीबीआई और हाजी महबूब अहमद की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ तकनीकी आधार पर किसी को राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने सीबीआई से पूछा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब आरोपियों को साजिश रचने के आरोप से बरी कर दिया तो पूरक चार्जशीट दाखिल क्यों नहीं की गई?

अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद भाजपा और हिंदू संगठनों के 13 नेताओं पर आईपीसी की धारा 120 बी के तहत आपराधिक साजिश रचने का केस दर्ज किया गया था। रायबरेली की निचली अदालत ने सभी पर से आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने का आदेश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इसी की सुनवाई चल रही है।

याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 20 मई 2010 के आदेश को खारिज करने की मांग की गई है।  सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि विवादित ढांचा ढहाने के मामले में दो अलग अलग अदालतों में चल रही सुनवाई एक ही जगह क्यों न हो? क्यों न रायबरेली वाला मामला लखनऊ ट्रांसफर कर दिया जाए। बता दें कि इस मामले में कारसेवकों के खिलाफ मुख्य केस लखनऊ की ट्रायल कोर्ट में चल रहा है। 6 दिसंबर 1992 को जब अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस हुआ था उस समय कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद देशभर में दंगे भड़के थे। इनमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी।