चुनावों में कई चीजें फ्री देने के वादे करने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में आज भी सुनवाई हो रही है. केंद्र सरकार मुफ्तखोरी की घोषणाओं पर चिंता जता चुकी है. कोर्ट आज विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश जारी कर सकता है.

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चुनाव में मुफ्त सुविधाओं का वायदा करने वाली राजनीतिक पार्टियों की मान्यता रदद् करने की मांग वाली अश्विनी उपाध्याय की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. चीफ जस्टिफ ऑफ इंडिया ने कहा कि सवाल ये है कि अदालत के पास आदेश जारी करने की शक्ति है, लेकिन कल को किसी योजना के कल्याणकारी होने पर अदालत में कोई आता है तो क्या यह सही होगा.

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सीजेआई ने कहा कि ऐसे में यह बहस खड़ी होगी कि आखिर न्यायपालिका को क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए? सरकारें इस पर चर्चा करें और विशेषज्ञ समिति के गठन का जहां तक सवाल है, आप लोग अपनी राय दें. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से सीजेआई ने राय मांगी. CJI ने कहा कि सवाल ये है कि चुनाव के दौरान मेनिफेस्टो में किए गए वादों को रेगुलेट किया जाना चाहिए. CJI ने कहा कि लैपटॉप तक फ्रीबीज में दिए गए हैं, मैं क्या उदाहरण दूं. मैं जिम्मेदारी चुनाव आयोग को देता हूं तो आयोग किन आधारों पर चुनावी वादों पर रोक लगाएगा.

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सीजेआई ने कहा कि यह बहुत ही जटिल मुद्दा है. फ्रीबीज और कल्याणकारी योजनाओं के बीच अंतर रखना जरूरी है. यह सिर्फ एक पहलू से जुड़ा मसला नहीं है। हम पूरे मामले पर व्यापक स्तर पर जाना चाहते हैं. संसद को इस पर चर्चा करनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर गांवो में कोई रोजगार देता है और कोई साइकिल देकर कहता है कि इससे जीवन बेहतर होगा. यह वाकई में हाशिए पर रहने वालों के लिए जरूरी है. किस तरह से अंतर रखा जाए.

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सीजेआई ने कहा कि सभी राजनीतिक दल एकतरफ हैं, सभी को फ्रीबीज चाहिए. सीजेआई ने कहा हम ये नहीं कह रहे कि चुनाव आयोग ही इस पर सबकुछ करे या उसे शक्ति प्रदान कर दी जाए. एक गैर राजनीतिक संस्था या समिति इस पर विमर्श करे, ताकि स्पष्टता आए. सिब्बल ने कहा कि वित्त आयोग को इस मामले में चर्चा करनी चाहिए. सीजेआई ने कहा कि सिब्बल कि ओर से एक नोट इस मामले में कोर्ट को दिया गया है.

एसजी तुषार मेहता ने कहा कि पहला यह कि कोई भी राजनीतिक दल की जिम्मेदारी पर बात नहीं कर रहा, जबकि कोई दल बिजली फ्री और तमाम वादे चुनाव जीतने को करता है. दिल्ली इसका एक उदाहरण है. सीजेआई ने कहा कि या तो चुनाव आयोग यह मसला देख ले. लेकिन योजनाएं सिर्फ चुनाव के दौरान तक सीमित नहीं रहती. केंद्र कि ओर से मेहता ने कहा कि जब सरकार के पास पैसा ना हो और वह चुनाव जीतने के लिए खर्च करे तो क्या यह सही है? इसकी वजह से अर्थव्यवस्था लचर हो जाती है. यह गंभीर मुद्दा है.

याचिकाकर्ता कि ओर से विकास सिंह ने कहा कि यह फ्रीबीज अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली प्रैक्टिस है. सिंह ने कहा कि जब कोई राज्य 6 लाख करोड़ के कर्ज में हो और वह वादा करे कि चुनाव जीते तो 6 लाख करोड़ कि योजनाएं लाएंगे. मेरा कहना है कि संतुलन होना चाहिए. सीजेआई की पीठ के समक्ष सिंह ने कहा कि सुब्रमण्यन बालाजी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज को करेप्ट प्रैक्टिस कहा है. याचिकाकर्ता के वकील विकास सिंह ने कहा यह एक गंभीर मुद्दा है जिसके विनाशकारी आर्थिक परिणाम हो सकते हैं. यह एक कानूनी समस्या है. उन्होंने कहा की चुनावी गिफ्ट देने के लिए पार्टियां पैसे कहां से लाएंगे? ये मतदाता को जानने का अधिकार है, साथ ही करदाता को भी पता होना चाहिए. इसलिए राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों को चुनाव घोषणापत्र में यह बताना होगा कि पैसा कहां से आएगा.

याचिकाकर्ता ने कहा कि हम एक प्रोफार्मा तैयार कर देते हैं जो आधार बनाया जा सकता है. आयोग जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव के दौरान वित्तीय प्रभाव को लेकर कदम उठा सकता है. विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाना चाहिए ताकि इस मामले पर समुचित निचोड़ निकल कर सामने आए और उचित व्यवस्था बन सके.