नागालैंड का नाम सुनते ही ऐसा लगता है कि हम कहीं भारत से बाहर की बात कर रहे हैं क्योंकि यहां की संस्कृति को देखने से ऐसा ही महसूस होता है कि यह भारत में स्थित नहीं है। लेकिन नागालैंड भारत का ही सबसे छोटा राज्य है। यह म्यांमार, भूटान के करीब है। इसकी पूर्वी सीमा म्यांमार से लगती है तो बाकी की तीन सीमाएं असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से लगी हुई हैं। 

वैसे नागालैंड अपने रहन सहन, पहनावे, वेश-भूषा के साथ-साथ अपने अजीबोगरीब खाने के डिश के लिए भी जाना जाता है। यहां के लोग चिकन, मटन, मछली के अलावा कुत्ता, कछुआ, कीट, चीटी, वर्म इत्यादि के साथ-साथ सिल्क वार्म भी खाते हैं। वो भी स्पेशल डिश बनाकर। जी हां, नागालैंड के मांस बाजारों में सिल्क वार्म 600 रुपए प्रति किलो से भाव से बिकती है। और ये यहां आसानी से बाजार में मिल जाता है।

दरअसल, सिल्क के कीड़े जब एक अवधि के बाद सिल्क उत्पन्न करना बंद कर देते हैं। तब इन कीड़े का उपयोग नागालैंड में अलग-अलग तरीके से इसका डिश बनाकर खाने के रूप में करते हैं। सिल्क वर्म से प्यूपा डिश बनाया जाता है। प्यूपा डिश एक असमिया व्यंजन भी है। इस डिश को स्थानीय मसालों का उपयोग करके तैयार किया जाता है। मुंह में घुलने वाला यह व्यंजन देखने में भी लाजवाब होता है। यहां के लोग प्यूपा को खूब पसंद से खाते हैं। फेस्टिवल में ये डिश विशेष रूप से बनाया जाता है। 

ये है मुख्य भोजन

बता दें कि नागालैंड के जनजातीयों का मुख्य भोजन चावल और मांस होता है। चुकि ये लोग अधिक दिनों तक शिकारी रहे हैं। इसलिए यहां के लोगों को जंगली जानवरों का मांस बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यहां के जनजाति टाइगर और लैपर्ड का शिकार नहीं करते हैं। यहां की प्रचलित कथाओं में टाइगर और लैपर्ड को भाई का दर्जा दिया जाता है। इसके अलावा यहां के लोग हर तरह के जानवरों, जीव जन्तुओं का मांस खाते हैं। यहां पर कुत्ते के मांस को बुशमीट कहते हैं। जैसे अन्य राज्यों के नॉनवेज खाने वालों में चिकन और बकरे का मीट के बिना काम नहीं चलता है वैसे ही यहां पर बुशमीट के बिना यहां के लोगों का पेट नहीं भरता है। यहां के लोगों का मुख्य भोजन तो पोर्क, चिकन से बनता है लेकिन यहां के लोग सांप, घोंगे, गिलहरी, चूहे, बिल्ली, कुत्ते, बैल जैसा दिखने वाला जानवर मिथुन, भैंसा, मकड़ी, चिड़िया, केकड़ा, बंदर, मधुमक्खी का लार्वा, झींगा को भी चाव से खाते हैं।

गौर हो कि नागालैंड की केवल 9 प्रतिशत भूमि समतल है। बाकी यहां का क्षेत्र मनोरम पहाड़ियों और जंगलों में सिमटा हुआ है। यहां के 20 लाख लोग 19 जनजातियों में बंटा हुए हैं लेकिन अंग्रेजी भाषा और इनकी सांस्कृतिक धरोहर एक दूसरे को आपस में जोड़े हुए है। यहां की रहने वाले जनजातीय काफी पहले से ही शिकारी रहे हैं। शिकारी होने के कारण ये अच्छे लड़ाकू हैं। इसका फायदा अंग्रेजों ने उठाया और इन्हें बाहर कई देशों में लड़ने के लिए भेजा। इसका फायदा इन जनजातियों को यह हुआ कि इन्हें अपना और अपने क्षेत्र का विकास करने की समझ आ गयी और आज के दीमापुर और कोहिमा ऐसे दो बड़े शहर हैं जो भारत के किसी भी महानगर को अच्छी-खासी टक्कर देने की क्षमता रखते हैं। चूंकि इस राज्य में जंगल और पहाड़ दो ही प्रमुख हैं तो यहां का खान-पान भी इन्हीं दोनों पर आधारित है।