नागालैंड में अपनी खोई जमीन वापस हासिल करने के लिए देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस विद्रोही समूहों तक पहुंच बना रही है। इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी अभी से समाज के विभिन्न हिस्सों तक अपनी पकड़ मजबूत करने के वास्ते कमर कस चुकी है। इस साल होने वाले 60 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव की तैयारियों की समीक्षा करने के लिए भारत निवार्चन आयोग (ईसीआई) का एक दल राज्य के दौरे पर है। 2018 के पिछले राज्य चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं रही थी। 2013 में कांग्रेस के आठ विधायक थे। 

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पिछले महीने, नागालैंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एनपीसीसी) के अध्यक्ष के थेरी ने सभी समान विचारधारा वाले नेताओं और राजनीतिक दलों को एक धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाने के लिए हाथ मिलाने को कहा था। हालांकि कांग्रेस के लिए नागालैंड में चुनावी अभियान आसान नहीं होगा। राज्य में कांग्रेस की वापसी कई कारकों पर निर्भर करेगी। सबसे पहले तो पार्टी को ईसाई बहुल इस राज्य में एक मजबूत हिंदुत्व विरोधी रुख अपनाना होगा। इसके अलावा, नागा शांति वार्ता में देरी भी एक फैक्टर हो सकता है। 

राज्य में अपनी स्थिति को फिर से हासिल करने के लिए पार्टी चर्च और नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजी) के साथ बातचीत कर रही है। एनएनपीजी छह नागा विद्रोही समूहों का सबसे बड़ा निकाय है। सीधे शब्दों में कहें तो एनएनपीजी राज्य से सबसे ज्यादा प्रभावशाली छह नागा विद्रोही समूहों का छत्र निकाय है। इसके तहत आने वाले विद्रोही समूह नागालैंड में सबसे प्रभावशाली हैं और नागा मतदाताओं पर अच्छा खासा प्रभाव डालते हैं।

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नगा शांति वार्ता बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है। 2018 में सत्ता में आने से पहले एनडीपीपी-बीजेपी गठबंधन ने सात दशक लंबे संघर्ष का समाधान देने का चुनावी वादा किया था। कांग्रेस फिलहाल इस वादे को पूरा ना कर पाने और इसमें हो रही देरी पर ध्यान केंद्रित कर रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के राज्य प्रभारी रणजीत मुखर्जी ने बताया, हम बीजेपी-एनडीपीपी के विपरीत ऐसा कुछ वादा नहीं करने जा रहे हैं जिसे हम पूरा नहीं कर सकते। उन्होंने समाधान का वादा किया था, लेकिन उस वादे को पूरा नहीं किया।