भारतीय सेना (Indian Army) ने एक मेजर जनरल-रैंक के अधिकारी (Major General-Rank Officer) के तहत नागालैंड नागरिक हत्याओं की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इंक्वायरी (Court of Inquiry) की स्थापना की है. सेना के सूत्रों ने बताया कि अधिकारी केवल पूर्वोत्तर सेक्टर में तैनात है. सूत्रों ने बताया कि दीमापुर स्थित भारतीय सेना की 3 कोर ने नागालैंड गोलीबारी (Nagaland Firing) की घटना के संबंध में एक मेजर जनरल रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता में आंतरिक जांच शुरू कर दी है.

गौरतलब है कि नागालैंड के मोन जिले में 4 दिसंबर को सुरक्षा बलों की गोलीबारी में कम से कम 14 नागरिकों की मौत हो गई. इतना ही नहीं, इस घटना के बाद हुई हिंसा में एक सैन्यकर्मी की भी जान चली गई और कई जवान घायल हो गए. अधिकारियों ने कहा कि NSCN (K-YA) कैडरों की आवाजाही के बारे में विशेष खुफिया जानकारी के आधार पर असम से पैरा स्पेशल फोर्स (Para Special Forces) को ऑपरेशन के लिए लाया गया था.

एक अधिकारी के मुताबिक, ‘सेना ने गलत लोगों को निशाना बनाया. उन्हें शक था कि वाहन में आतंकवादियों का समूह है. इसलिए उन्होंने नागरिकों पर गोलियां चला दीं.’ इसके बाद ग्रामीणों ने इकट्ठा होकर राइफलें और रेडियो सेट छीन लिए और गुस्से में सैनिकों पर चाकू से हमला कर दिया. इन झड़पों में आठ और नागरिकों की मौत हो गई. बता दें कि सीएम नेफ्यू रियो (Nagaland CM Neiphiu Rio) आज मोन जिले के ओटिंग (Oting) में गोलीबारी में मारे गए नागरिकों के अंतिम संस्कार में शामिल हुए.

इस दौरान उन्होंने कहा, ‘गृह मंत्री जी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं. हमने घटना में प्रभावित लोगों को सहायता राशि दी है. हम केंद्र सरकार (Central Government) से कह रहे हैं कि नागालैंड से AFSPA कानून को हटाया जाए क्योंकि इस कानून ने हमारे देश की छवि धूमिल कर दी है.’ AFSPA कानून, पूर्वोत्तर के विवादित इलाकों में सुरक्षाबलों को विशेष अधिकार देती है. इसके तहत सुरक्षाकर्मियों को तलाशी अभियान चलाने और किसी को भी बिना किसी वारंट के गिरफ्तार करने की अनुमति दी गई है.

इतना ही नहीं, संदेह की स्थिति में सुरक्षाकर्मियों को किसी भी गाड़ी को रोकने, तलाशी लेने और उसे जब्त करने का अधिकार होता है. गिरफ्तारी के दौरान वे किसी भी तरह की शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं. AFSPA के प्रावधान पूर्वोत्तर के देश के सात राज्यों में लागू हैं. शुरुआत में इस कानून को अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा में लागू किया गया था. बढ़ती उग्रवादी गतिविधियों के चलते साल 1990 में जम्‍मू-कश्‍मीर में भी इस कानून को लागू किया गया था.