राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को स्पष्ट किया कि 24 सितम्बर का उसका पत्र अनुशंसात्मक था और इसका मतलब बाल गृहों में रह रहे सभी बच्चों को उनके अभिभावकों के घरों में भेजना कभी भी नहीं था। एनसीपीसीआर ने कहा था कि कानून के अनुसार बाल गृहों में रह रहे बच्चों को उनके अभिभावकों के पास भेजा जायेगा। 

हालांकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस संबंध में एक पत्र जारी किया और 24 सितंबर के पत्र को निष्प्रभावी कर दिया है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की एक पीठ ने कहा कि चिंता केवल इसलिए थी क्योंकि एनसीपीसीआर का एक पत्र सभी मुख्य सचिवों को यह निर्देश देते हुए प्रतीत हो रहा है कि वे सभी बच्चों को उनके अभिभावकों के पास भेज दें। 

पीठ ने कहा, ‘अब जब आपने स्पष्ट कर दिया है तो हम अंतरिम आवेदन का निस्तारण करेंगे। हम केवल इतना चाहते हैं कि किसी भी बच्चे को उनके अभिभावकों के वापस भेजने से पहले किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों का पालन किया जाये।’ उसने कहा कि बच्चों को केवल किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार आकलन के बाद भेजा जा सकता है। 

एनसीपीसीआर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि न्याय मित्र गौरव अग्रवाल ने पत्र के बारे में चिंता जताई है लेकिन यह केवल अनुशंसा की गई थी और अनिवार्य नहीं था। अग्रवाल ने कहा कि उन्हें नौ अक्टूबर को अंतिम सुनवाई के समय महिला और बाल विकास मंत्रालय के आदेश की जानकारी नहीं थी। मेहता ने कहा कि एनसीपीसीआर का मतलब बाल गृहों में रह रहे बच्चों को उनके अभिभावकों को सौंपना कभी भी नहीं था। 

उच्चतम न्यायालय ने नौ अक्टूबर को एनसीपीसीआर से उस पत्र पर जवाब तलब किया था जिसमें आठ राज्यों को बाल गृहों में रह रहे बच्चों को उनके परिवारों को सौंपना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। देश के बाल गृहों में रह रहे 70 प्रतिशत बच्चे इन्हीं आठ राज्यों के हैं। एनसीपीसीआर ने तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मिजोरम, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और मेघालय के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि कोविड-19 महामारी को देखते हुये इन बच्चों को उनके परिवारों को सौंपा जाए। शीर्ष अदालत ने पत्र पर संज्ञान लेते हुए एनसीपीसीआर को नोटिस जारी किया था।