पूर्वोत्तर में सबसे शांत रहे पर्वतीय राज्य मिजोरम में अब एक बार नए सिरे से उग्रवाद सिर उठाने लगा है। एक ओर जहां पड़ोसी म्यांमार में उग्रवादी संगठन दोबारा एकजुट होने लगे हैं वहीं एक अन्य पड़ोसी बांग्लादेश ने भी राज्य के सीमावर्ती इलाको में उग्रवादियों का प्रशिक्षण शिविर चलने का आरोप लगाया है। हालांकि मिजोरम सरकार ने उसके इस आरोपों को निराधार बताया है।

दूसरी ओर, म्यांमार में उग्रवादी संगठनों और खासकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) के खापलांग गुट की बढ़ती सक्रियता सरकार के लिए चिंता का विषय बन गई है। भारतीय विदेश सचिव हर्ष सिंगला और थल सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवने की हाल की दो-दिवसीय म्यामांर यात्रा के दौरान भी इस मुद्दे पर विचार-विमर्श किया गया था। सुरक्षा एजंसियों का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान सुरक्षा के मोर्चे पर पहले की तरह ध्यान नहीं दिए जाने का फायदा उठाते हुए इन संगठनों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं और हाल में भारतीय सुरक्षा बलों पर कई हमले भी किए हैं।

असम की राजधानी गुवाहाटी में भारत के सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और बांग्लादेश के बॉर्डर गार्ड्स (बीजीबी) के बीच महानिदेशक स्तर की 51वीं बैठक के बाद बांग्लादेश की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि बांग्लादेश की चटगांव पहाड़ियों के सशस्त्र अलगाववादी गुटों ने मिजोरम में अपने शिविर स्थापित किए हैं। उसने भारत सरकार से उन शिविरों को नष्ट करने की अपील भी की है। बीजीबी के महानिदेशक शफीनुल खान ने यह भी दावा किया कि बांग्लादेश से भारत में कोई घुसपैठ नहीं हो रही है। लेकिन बीएसएफ के महानिदेशक राकेश खन्ना ने कहा कि बीएसएफ ने अवैध रूप से भारत में घुसने का प्रयास करने वाले 3,204 लोगों को गिरफ्तार किया है। यह सब बांग्लादेशी नागरिक हैं। महानिदेशक ने कहा कि बांग्लादेश ने पहले भी मिजोरम में उग्रवादियों के शिविर होने का दावा किया था। लेकिन जांच के बाद वह दावा सही नहीं पाया गया था।

बांग्लादेश के पहली बार सार्वजनिक रूप से मिजोरम में उग्रवादी शिविरों की स्थापना के दावे को भारत-बांग्लादेश संबंधों में हाल में आई कड़वाहट से जोड़ कर देखा जा रहा है। बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और एनआरसी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के संबंधों में खाई बढ़ी है। इसके अलावा तीस्ता समेत कई अन्य नदियों के पानी के बंटावरे पर भी दशकों से गतिरोध बना हुआ है।

 बांग्लादेश की चटगांव पहाड़ियों में 1970 के दशक में चकमा और त्रिपुरी आदिवासियों ने शांतिवाहिनी नामक एक अलगाववादी गुट का गठन जरूर किया था। लेकिन वर्ष 1997 में बांग्लादेश के साथ हुए एक समझौते के बाद इसके तमाम सदस्यों ने हथियार डाल दिए थे। अब बांग्लादेश सरकार ने एक बार फिर उस इलाके के उग्रवादियों के सक्रिय होने और मिजोरम में शरण लेने का आरोप लगाया है।

मिजोरम पुलिस ने भी बांग्लादेश के आरोपों का खंडन किया है। राज्य के डीआईजी (उत्तरी रेंज) लालबाइकथांगा खियांग्ते कहते हैं, "पड़ोसी देश का आरोप सही नहीं है। राज्य में बांग्लादेशी उग्रवादी गुटों की कोई मौजदूगी नहीं है।” उनका कहना था कि मीडिया में इस आशय की खबरें सामने आने के बाद पुलिस ने इस मामले की गहन जांच की है। लेकिन ऐसे किसी शिविर का अस्तित्व सामने नहीं आया है। वह कहते हैं, "बांग्लादेश सरकार पहले भी मिजोरम में उग्रवादी गुटों की मौजूदगी के आरोप लगाती रही है। मिजोरम उग्रवाद-मुक्त राज्य है। यहां पहले सक्रिय तमाम हथियारबंद गुटों ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया है।”

इस बीच, भारत सरकार ने म्यामांर में यूनाइटेड स्टेट आर्मी और अराकान आर्मी समेत तमाम उग्रवादी गुटों की बढ़ती सक्रियता को इलाके की सुरक्षा और आधारभूत परियोजनाओं के लिए खतरा बताया है। सरकार का आरोप है कि चीन इन उग्रवादी संगठनों को हथियारों की सप्लाई कर रहा है। यह संगठन पूर्वोत्तर के सक्रिय उग्रवादी गुटों को भी म्यामांर में शरण और प्रशिक्षण दे रहे हैं।