पूर्वोत्तर भारत में मेघालय राज्य (Meghalaya State in Northeast India) में मिट्टी का कटाव (soil erosion) एक गंभीर समस्या है। यह एक ऐसा राज्य है जहां बहुत अधिक बारिश होती है। यहां की भौगोलिक स्थिति के कारण खेती के लिए किसानों को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पर नयी कृषि प्रणाली ने यहां के किसानों के किसानो के बीच एक आशा की किरण पेश की है।

इस नयी तकनीक से किसानों की आय बेहतर हुई है। मेघालय (Meghalaya) में इस नयी प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए ही आईसीएआर ने एकीकृत कृषि प्रणाली को यहां पर बढ़ावा दिया है। क्योंकि वक्त के साथ यहां पर यहां की जनसंख्या भी लगभग दोगुनी हो गयी है। बढ़ती आबादी के कारण खेतों पर दवाब भी बढ़ा। 1991 से लेकर 2011 मेघालय की आबादी 18 लाख से 30 लाख तक पहुंच गयी है। राज्य सरकार के मुताबिक राज्य में 70% से अधिक आबादी “कृषि और संबद्ध गतिविधियों” में लगी हुई है, और जैसे-जैसे प्रति व्यक्ति कृषि भूमि सिकुड़ती जाती है, लोग खेती के लिए पहाड़ियों की ढलानों की ओर रुख करते हैं।

मेघालय में खासी समुदाय (Khasi community in Meghalaya) के किसान थ्रिसिलॉन रेनहांग thirdpole को बताया कि उन्होंने सीढ़ीनुमा खेत में गोभी, हरी मटर और गाजर की खेती की थी। इसके अलावा अदरक मिर्च और हल्दी की भी खेती की थी। रेनहांग ने अपने उत्पाद को भोइरिम्बोंग बाजार में बेचा और 15000 रुपए की कमाई की। वह रिभोई जिले में रहती है। वहीं दूसरे किसान रिंघांग ने कहा कि उन्हें इस मौसम में अमरूद और पपीते की अच्छी फसल की उम्मीद है। रिघांघ ने कहा कि 2015 तक वह झूम तकनीक से खेती करते थे। इस तकनीक से चावल और मकई की खेती के बेहतर कमाई की थी। यह एक ऐसी तकनीक है जिससे में पहाड़ों की ढलानों में स्थित झाड़ियों की सफाई करने के बाद खेती की जाती है फिर इसे छोड़ दिया जाता है। फिर इसे छोड़कर किसान दूसरी पहाड़ी में जाकर इसी तरह से खेती करते थे। राज्य में मिट्टी कटाव का यह सबसे बड़ा कारण था।

थ्रिसिलॉन रेनहांग ने बताया कि पहले पहाड़ियों पर चलना और फसलों की देखभाल करना थकाऊ हो था, इसके बाद भी आय अधिक नहीं होती थी। इसके बाद उन्होंने 2015 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। यह कार्यक्रम एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के बारे में था और इसका आयोजन ( ICAR ) द्वारा राज्य की राजधानी शिलांग के पास उमियम में किया गया था। प्रशिक्षण हासिल करने के बाद उन्होंने अपने एक प्लॉट पर IFS को अपनाया और अब उपज की मात्रा और बाजार की कीमतों के आधार पर प्रति वर्ष 50,000-100,000 कमाती है। इससे पहले उनकी कमाई 30,000-50,000 रुपये थी क्योंकि उसकी फसल या तो कीटों के हमले के कारण खराब हो जाती थी या अच्छी कीमत नहीं मिलती थी।