नई दिल्ली। मणिपुर से एक चौंकाने वाली खबर आई है जिसके तहत 19वीं शताब्दी के मध्य में महाराजा चंद्रकृति के शासन के दौरान तत्कालीन मणिपुर साम्राज्य की बर्मा के साथ पूर्वी सीमा को चिह्नित करने के लिए स्थापित 3 पत्थर गायब हो गए हैं। इसको लेकर कला और संस्कृति विभाग के संयुक्त निदेशक कीथेलकपम दिनमणि ने बताया कि यह मामला तब सामने आया जब 9 सदस्यीय दल आंतरिक कामजोंग जिले के एक शोध दौरे पर गया।

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टीम को चंद्रकृति महाराज की पत्थर की दो नक्काशियां मिलीं, जो सनलोक और नामफालोक नदियों के संगम पर पहले मिली थीं, गायब हो गई हैं। इन पत्थरों पर बंगाली लिपि में एक शिलालेख और चंद्रकृति के पदचिन्हों की नक्काशी थी। दिनमणि ने कहा कि पास के चट्रिक खुल्लेन गांव में हनुमान की छवि वाला एक अन्य शिलाखंड भी गायब पाया गया।

यह टीम सात अप्रैल से यहां से करीब 150 किलोमीटर दूर इलाके के तीन दिवसीय दौरे पर थी। दिनमणि ने कहा कि टीम ने स्थानीय ग्रामीणों से उत्कीर्णन के साथ पत्थरों को वापस करने की अपील की और यहां तक कि एक मौद्रिक पुरस्कार की भी पेशकश की।

वह स्थान जहाँ से पत्थर ष्गायबष् हुए थे, निर्जन है और घने जंगलों से घिरा हुआ है। निकटतम गांव कम से कम 4 या 5 किमी दूर है। उन्होंने कहा कि 2011 में, पुरातात्विक टीमों ने पाया था कि पत्थर के शिलालेखों को उनकी मूल स्थिति से हटा दिया गया था। दिनमणि ने कहा कि टीम उस समय पत्थरों को निकाल सकती है और उन्हें मूल स्थानों पर रख सकती है।

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यह देखते हुए कि तत्कालीन मणिपुर शासकों द्वारा सीमाओं का सीमांकन करने के लिए उत्कीर्ण पत्थरों का उपयोग किया गया था, दिनमणि ने कहा कि राज्य के दक्षिणी भाग में तुइवई और बराक नदियों के संगम पर तिपाईमुख में चुराचंदपुर जिले के बेहियांग में शिलालेख और कोहिमा पत्थर इसकी गवाही देते हैं।