चुनावी माहौल में सियासत अपने चरम पर है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा के साथ-साथ देश की "7 सिस्टर्स" में से एक राज्य मणिपुर में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. राज्य में कुल दो चरणों में वोटिंग होगी, पहले चरण की वोटिंग 27 फरवरी और दूसरे चरण की वोटिंग 3 मार्च को होगी.

राज्य में फिलहाल बीजेपी के पास 31 विधायक हैं और उसे 4 विधायकों वाली एनपीएफ और 3 विधायकों वाली एनपीपी का समर्थन प्राप्त है. 2017 के चुनाव में 28 सीटें जितनी वाली कांग्रेस के पास अब महज 13 विधायक बचे हैं. शेष विधायक या तो बीजेपी में शामिल हो चुके हैं या फिर सस्पेंड चल रहे हैं.

बता दें कि वर्ष 1962 में केंद्रशासित प्रदेश अधिनियम के अंतर्गत 30 चयनित सदस्यों तथा तीन मनोनीत सदस्यों को मिलाकर 33 सदस्यीय विधानसभा की स्थापना की गई थी. इसके बाद 21 जनवरी, 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और 60 निर्वाचित सदस्यों वाली विधानसभा गठित की गई. इस विधानसभा में 19 सीटों को अनुसूचित जनजाति और 1 सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखा गया था. इसके बाद राज्य में सीटों की संख्या को बढ़ाया गया.

मणिपुर विधानसभा चुनावों का इतिहास

मणिपुर में हर बार की तरह इस बार भी काफी रोमांचक चुनावी मुकाबला देखने को मिल सकता है. राज्य की विधानसभा का कार्यकाल 19 मार्च 2022 को खत्म हो रहा है, ऐसे में समयावधि से पहले ही नई सरकार का गठन होगा. वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन, थोड़ी उथल-पुथल के बाद राज्य में सरकार भारतीय जनता पार्टी ने सहयोगियों के साथ बनाई थी.

एन बीरेन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.

बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 28 और भाजपा को 21 सीटों पर जीत मिली थीं. इसके अलावा नेशनल पीपल्स पार्टी और नागा पीपल्स फ्रंट को चार-चार सीटों पर जीत हासिल हुई थी. लोजपा और टीएमसी ने भी एक-एक सीट पर जीत हासिल की थी. चुनाव के बाद भाजपा ने नेशनल पीपल्स पार्टी, नागा पीपल्स फ्रंट, लोजपा के अलावा दो अन्य विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाने के जादुई आंकड़े को छुआ था, जिसके बाद एन बीरेन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.

कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 28 सीटें हासिल की थी 

मणिपुर में लगातार तीन बार के कांग्रेस शासन के दौर को इस तरह से याद किया जा सकता है कि ओकराम इबोबी के नेतृत्व में साल 2002 से लेकर 2017 तक लगातार 15 सालों तक कांग्रेस की सरकार रही. पिछले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का वोट शेयर कुछ कम जरूर हुआ, लेकिन 15 साल की एंटी इनकंबेंसी भी कांग्रेस का जलवा खत्म नहीं कर पाई और पार्टी ने सबसे ज्यादा 28 सीटें हासिल की.

बीजेपी-कांग्रेस में रही कांटे की टक्कर

मणिपुर राज्य की स्थापना के बाद यहां स्थानीय नेताओं और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव चुनावों में देखने को मिला. 1972 के विधानसभा चुनावों में कुल 19 निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली. इसके बाद 1974 के चुनावों में मणिपुर पीपुल्स पार्टी के 20 उम्मीदवार जीते. 1980 में एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशियों का जोर देखने को मिला और 20 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. इसके बाद कांग्रेस ने यहां पर फोकस करते हुए अपनी लय बनाई और लगातार तीन बार सरकार बनाई. वर्ष 2002, 2007 और 2012 में कांग्रेस ने यहां क्रमशः 20, 30 और 42 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की.

बीजेपी ने 2017 के चुनावों में सबको चौंका दिया था 

राज्य के बनने के बाद से भारतीय जनता पार्टी का पूर्वोत्तर में कोई ख़ास प्रभाव नहीं रहा, लेकिन इन सबके बावजूद बीजेपी ने 2017 के चुनावों में सबको चौंका दिया. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही बीजेपी ने इस चुनाव में कुल 21 सीटें जीतीं और पूरा खेल पलट दिया. बीजेपी ने न यहां सिर्फ सरकार बनाई बल्कि पार्टी के एजेंडे को भी राज्य में स्थापित करने की भरपूर कोशिश की.

बीजेपी के अलावा मणिपुर में तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, आरजेडी, जेडीयू और लेफ्ट दलों का समय-समय पर प्रभाव रहा, लेकिन राज्य में पूर्ण विकल्प के रूप में कांग्रेस के अलावा ज्यादातर समय मणिपुर राज्य कांग्रेस पार्टी (MCRP) या निर्दलीय विधायक ही रहे. 2017 के चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ, जब राज्य में लड़ाई क्षेत्रीय दल बनाम कांग्रेस न होकर कांग्रेस बनाम बीजेपी की हुई.

500 से कम वोटों के अंतर वाली सीटें

2017 में मिली यह जीत बीजेपी का भरोसा बढ़ाने वाली जीत थी. बीजेपी के 28 प्रत्याशी 28 सीटों पर दूसरे नंबर पर रहे थे. इसके अलावा 5 सीटें ऐसी थीं, जहाँ बीजेपी और दूसरे दलों के प्रत्याशियों के बीच हार-जीत का अंतर 500 से कम वोटों का था. इन क्षेत्रों में उखरुल, ककचिंग, नाम्बोल, सगोल्बंद, थांगमेबंद शामिल हैं.

ऐसा रहा वोट प्रतिशत का ट्रेंड

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सर्वाधिक 34.30% मत मिले. इसके बाद मणिपुर पीपुल्स पार्टी को 15.45% वोट मिले, जिसके कुल 5 प्रत्याशियों को जीत मिली. 2012 में कांग्रेस का वोटशेयर 42.4% पर पहुंच गया और पार्टी को 42 सीटों को जीत मिली. 2012 के चुनावों में दूसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उसने 17.0% वोट हासिल करते हुए 7 सीटों पर जीत हासिल की.

इसके बाद राज्य में काफी कुछ राजनीतिक उथलपुथल देखने को मिली और वर्ष 2014 में ओकराम इबोबी के नेतृत्व में मणिपुर राज्य कांग्रेस पार्टी (MCRP) ने कांग्रेस में विलय होने का निर्णय लिया, जिसके बाद राज्य में कांग्रेस की सीटों की संख्या 47 तक पहुंच गई. हालांकि 2017 के चुनावों में कहानी इसके कुछ उलट दिखी और बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में कांटे की टक्कर देखने को मिली. कांग्रेस को इस चुनाव में 35.1% वोट मिले, जबकि बीजेपी को 36.3% वोट मिले.

क्षेत्रीय दलों का भी प्रभाव

राज्य में क्षेत्रीय दलों का भी प्रभाव बड़े स्तर पर देखने को मिला. वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में 31 सीटों पर, 2007 के चुनाव में 20 सीटों पर, 2012 में 13 सीटों पर, 2017 के चुनाव में 10 सीटों पर क्षेत्रीय दलों के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की. इन क्षेत्रीय दलों की सूची में एनसीपी, टीएमसी, आरजेडी, जेडीयू, लोजपा, एफपीएम और एमसीआरपी शामिल हैं.

इस बार के चुनाव में BJP की पकड़ मजबूत

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अकेले जाने का निर्णय लिया है और चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करने का ऐलान किया है, जबकि राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित पांच छोटे दलों के साथ गठबंधन की घोषणा की है. मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, जो खुद कभी कांग्रेस के नेता रहे, इस चुनाव में अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने उतरेंगे. राज्य में कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है, ऐसे में इस बार की लड़ाई बीजेपी-कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच हो सकती है.

"घाटी बनाम पहाड़ी" में मुकाबला

घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच जारी इस मुकाबले में आंकड़ें किसी भी ओर जा सकते हैं और पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा भी हो सकती है. राज्य की 60 में से 40 सीटें घाटी में आती हैं, जबकि 20 सीटें पहाड़ी इलाकों में. दोनों ही क्षेत्रों में कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों के फेवर में परिणाम रहे हैं. हालांकि पिछले बार के परिणामों के ट्रेंड को देखें तो बीजेपी ने पहाड़ी और घाटी दोनों ही इलाकों में सेंधमारी की है.

इसका प्रमुख कारण है केंद्र में बीजेपी की सरकार होना और कांग्रेस का अपने विधायकों को साथ लेकर न चल पाना. बीजेपी के नेता लगातार इस बात का दावा कर रहे हैं कि जितनी शांति बीजेपी के 5 साल के कार्यकाल में रही है, पूर्वोत्तर में इतनी शांति कभी नहीं देखी है. भाजपा इस चुनाव में बुनियादी ढांचे, ग्रामीण आवास, जलापूर्ति, बिजलीकरण और अन्य योजनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर चुनाव लड़ रही है.

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में, एनपीपी और एनपीएफ, दोनों अपने-अपने गढ़ में प्रभावशाली साबित हो सकते हैं. चूंकि एनपीएफ की भूमिका बसे हुए पहाड़ियों के एक हिस्से तक सीमित है, ऐसे में पूर्व के आधार पर ये दोनों ही पार्टियां पोस्ट पोल गठबंधन में भाजपा के साथ जा सकती हैं.

किस समुदाय का है दबदबा?

मणिपुर की सियासत में मतई समुदाय का 37 से अधिक सीटों दबदबा रहा है. पहाड़ी और घाटी दोनों ही इलाकों में मेतई समुदाय निर्णायक भूमिका में रहता है. इसके बाद 20 सीटों पर नागा और कुकी जनजातियों का दबदबा है, जबकि शेष 3-4 क्षेत्रों में राज्य के अल्पसंख्यकों का वर्चस्व है, जिन्हें 'पंगल' के रूप में जाना जाता है. बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनावों में मेतई समुदाय को साधने की पूरी कोशिश की थी. यही वजह थी कि पार्टी की सीटों में जबरदस्त इजाफा हुआ था.

इस बार के चुनाव में बीजेपी सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि कांग्रेस ने 40 सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं. बीजेपी की सहयोगी एनपीपी भी 20 सीटों पर ताल ठोकेगी।