भारतीय टीम के मिडफील्डर नीलकांत शर्मा, चिग्लेनसाना और कोथाजीत सिंह ने मणिपुर की राजधानी इंफाल की एक अकेडमी में एक साथ हॉकी का सफर शुरू किया। आज सालों बाद यह तीनों राष्ट्रीय टीम की ताकत बन चुके हैं। एक ऐसा राज्या जहां क्रिकेट भी नहीं बल्कि फुटबॉल की तूती बोलती थी वहां इन खिलाड़ियों ने एक नई मिसाल कायम की है। नीलकांत का यह सफर खासतौर पर मिसाल के लायक है क्योंकि उनके परिवार में कोई में दूर-दूर तक हॉकी से जुड़ा हुआ नहीं था।

नीलकांत जिस जगह के रहने वाले हैं वहां फुटबॉल खेलने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी। इसी कारण उन्हें काफी मुश्किलों का सामना किया लेकिन हालात चाहे जैसे भी रहे हो उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 16 साल की उम्र में हॉकी के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया था लेकिन उसी समय यह तय कर लिया था कि चाहे जो भी वह खाली हाथ नहीं लौटेंगे।

नीलकांत के पिता पंडित थे। उसी की कमाई से उनका घर चलता था। उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह हॉकी खेलेंगे, लेकिन यह उतना आसान नहीं था। फुटबॉल की लोकप्रियता के कारण हॉकी को ज्यादा महत्तव नहीं दिया जाता था। ग्राउंड पर अभ्यास के लिए उन्हें केवल वही समय मिलता था जब फुटबॉलर्स नहीं खेला करते थे। इस सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वह हमेशा से ही चिग्लेनसाना और कोथाजीत को अपनी प्रेरणा मानते आए। साल 2003 में उन्होंने PHAM अकेडमी में जाकर उनके साथ ट्रेनिंग की। जब दोनों सीनियर खिलाड़ी टीम इंडिया में चुने गए तो उनका भी हौंसला बढ़ गया था।

इसके बाद वह अंडर-17 खेलने भोपाल पहुंचे, जहां एक सीनियर कोच ने ओलिंपियन एमके कौशिक की अकेडमी में शामिल होने को कहा। साल 2011-13 से उन्होंने वहां ट्रेनिंग की। उस दौरान वहां होस्टल में भी उनके लिए सहकुछ आसान नहीं था। वह पहले 2014 हॉकी इंडिया लीग में खेले और फिर साल 2017 में उन्हें यूरोप के टूर के लिए टीम इंडिया में चुना गया। उन्होंने बेल्जियम के खिलाफ डेब्यू किया। उन्होंने अब तक सीनियर टीम के लिए 57 मुकाबले खेले हैं जिसमें उनके नाम 10 गोल हैं। वह आज भी अपनी सफलता का श्रेय कोथाजीत और चिग्लेनसाना को देते हैं।