हिंदू शास्त्रो में यज्ञोपवीत को ही जनेऊ (Janeu) कहा जाता है। जैसे कि हम जानते हैं कि जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है जिसे पुरुष अपने बाएं कंधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहनते हैं। जनेऊ को बेहद पवित्र माना जाता है और इसका कड़ाई से पालन किया जाता है।
क्या है जनेऊ  (Janeu) -

जनेऊ तीन सूत्रों से मिलकर बना है।
इसे देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतीक माना जाता है।
इसे सत्व, रज और तम का भी प्रतीक कहा जाता है।
एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं जो कि जनेऊ नौ तारों से निर्मित होता है. ये नौ तार शरीर के नौ द्वार एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र माने गए हैं।
इसमें लगाई जाने वाली पांच गांठें ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक हैं।
 
जनेऊ  (Janeu) के नियम

– यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथों को साफ करने के बाद ही इसे कान से उतारना चाहिए।

– यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए तो इसे बदल लेना चाहिए।

– इससे पहनने के बाद तभी उतारा जाता है, जब आप नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं. इसे कंठ में घुमाते हुए ही धो लिया जाता है।

– किसी भी व्यक्ति को तभी जनेऊ धारण करना चाहिए जब वो इसके नियमों को पूरी तरह पालन करने में सक्षम हो।