दुनिया में हर सिक्के के दो पहलु होते हैं। एक अच्छा होता है और एक बुरा होता है। जीवन में सुख होता है और दुख भी होता है। दोनों ही चीजें धरती पर संतुलन बना कर रखती है। घर में सुख, शांति और समृद्धि के लिए लोग मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। देवी लक्ष्मी जी को विष्णु-प्रिया यानी श्रीहरि की पत्नी बताया गया है। लोग अपनी सामर्थ्यानुसार भक्ति भाव से मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं।

मां लक्ष्मी सुख शांति समृद्धि व्यक्ति को देती है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि मां लक्ष्मी का भी कोई और पहलु हो सकता है। जी हां यह सच है कि लक्ष्मी का दूसरा पहलु अलक्ष्मी है। भागवत महापुराण में वर्णित है कि समुद्र-मंथन में कुल 14 रत्न निकले थे, इन्हीं में एक माँ लक्ष्मी थीं, जो श्रीहरि को वरण हुईं थी। लेकिन उनसे पूर्व समुद्र-मंथन से माता अलक्ष्मी का उद्भव हो चुका था।


अलक्ष्मी जब समुद्र मंथन से बाहर आयीं तो उनके हाथों मदिरा से भरा कलश था, तब राक्षसों की इच्छा पर भगवान विष्णु ने अलक्ष्मी को असुर पक्ष में शामिल होने की इजाजत दे दी थी। इसीलिए वे 14 रत्नों में शामिल नहीं हैं। अलक्ष्मी और लक्ष्मी का उद्भव जन्म समुद्र मंथन से हुआ था, इसीलिए दोनों को बहन माना जाता है। लक्ष्मी का जहां वास होता है वहां सुख समृद्धि होती है और अलक्ष्मी वास करती हैं, वहां अशुभ घटनाएं, पाप, आलस, गरीबी, दुख और बीमारियां निरंतर बनी रहती हैं।