मां अपनी संतान से सबसे ज्यादा प्यार करती है। इसके सुख सुविधा के लिए वह कुछ भी करती है। इसी तरह से उसकी सुख समृद्धि के लिए वह निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत रखती है। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत 28 सितंबर से शुरू होकर 30 सितंबर तक चलेगा।


बता दें कि इस व्रत को माताएं अपनी संतान के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और लम्बी आयु की कामना के लिए रखती हैं। यह व्रत निर्जला रखा जाता है। कुछ जगहों पर इस व्रत को जितिया या जिउतिया भी कहा जाता है।



व्रत से जुड़ी परम्परा:-


देश के सनातन धर्म में पूजा-पाठ में मांसाहार का सेवन बर्जित माना गया है। लेकिन इस व्रत की शुरुआत राज्य में कई जगहों पर मछली खाकर की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस परम्परा के पीछे जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा में वर्णित चील और सियार का होना माना जाता है। इस व्रत को रखने से पहले कुछ जगहों पर महिलाएं गेहूं के आटे की रोटियां खाने की बजाए मरुआ के आटे की रोटियां खाती है।


इसके साथ ही इस व्रत को रखने से पहले नोनी का साग खाने की भी परम्परा है। कहते हैं कि नोनी के साग में कैल्शियम और आयरन भरपूर मात्रा में होता है। जिसके कारण व्रती के शरीर को पोषक तत्वों की कमी नहीं होती है। साथ ही इस व्रत के पारण के बाद महिलाएं जितिया का लाल रंग का धागा गले में पहनती है। व्रती महिलाएं जितिया का लॉकेट भी धारण करती है। इसके अलावा पूजा के दौरान सरसों का तेल और खल्ली चढ़ाया जाता है। व्रत पारण के बाद यह तेल बच्चों के सिर पर आर्शिवाद के तौर पर लगाते हैं।