शीतला अष्टमी का त्योहार आने वाला है। यह त्योहार होली के आठ दिन मनाया जाता है। जिसमें माता शीतला की विधि विधान के साथ पूजा की जाती है। कहा जाता है कि शीतला अष्टमी के दिन बासा हुआ खाना खाया जाता है और चूल्हे को जलाने पर मनाही होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि मां शीतला को आरोग्य प्रदान करने वाली देवी  है।
माता शीतला की कृपा हो जाए उसे तमाम कष्टकारी रोगों से मुक्ति मिल जाती है। स्कंद पुराण माता शीतला को चेचक, खसरा और हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाने वाली देवी बताया गया है। इस बार शीतला अष्टमी का पर्व 25 मार्च को शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा।

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शीतला देवी की महिमा का गुणगान किया गया है। अगर व्यक्ति रोजाना शीतलाष्टक  स्तोत्र का पाठ करे, तो उस पर हमेशा माता शीतला की कृपा बनी रहती है और किसी भी तरह की बीमारी आस पास भी नहीं भटकती है। शीतला अष्टमी पर पूजा के समय जरूर पढ़ें शीतलाष्टक स्तोत्र

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शीतलाष्टक स्तोत्र

ॐ श्रीगणेशाय नमः, ॐ श्री शीतलायै नम: बोलकर इस स्तोत्र को प्रारंभ करें.
विनियोग

ॐ अस्य श्रीशीतला स्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, शीतली देवता, लक्ष्मी बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्वविस्फोटक निवृत्तये जपे विनियोगः

ऋष्यादि-न्यास


श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे.
ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः, इस मंत्र को 11 बार बोलें।
ईश्वर उवाच

वन्दे अहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् मार्जनी कलशोपेतां शूर्पालं कृत मस्तकाम्

वन्देअहं शीतलां देवीं सर्व रोग भयापहाम् यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत्

शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद्दारपीड़ितः विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति

यस्त्वामुदक मध्ये तु धृत्वा पूजयते नरः विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते

शीतले ज्वर दग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च प्रनष्टचक्षुषः पुसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम्

शीतले तनुजां रोगानृणां हरसि दुस्त्यजान् विस्फोटक विदीर्णानां त्वमेका अमृत वर्षिणी

गलगंडग्रहा रोगा ये चान्ये दारुणा नृणाम् त्वदनु ध्यान मात्रेण शीतले यान्ति संक्षयम्

न मन्त्रा नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम्
फल-श्रुति

मृणालतन्तु सद्दशीं नाभिहृन्मध्य संस्थिताम् यस्त्वां संचिन्तये द्देवि तस्य मृत्युर्न जायते

अष्टकं शीतला देव्या यो नरः प्रपठेत्सदा विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते

श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धा भक्ति समन्वितैः उपसर्ग विनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत्

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः

रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाख नन्दनः शीतला वाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः

एतानि खर नामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् तस्य गेहे शिशूनां च शीतला रूङ् न जायते

शीतला अष्टकमेवेदं न देयं यस्य कस्यचित् दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धा भक्ति युताय वै

श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाअष्टक स्तोत्रं