बिहार (Bihar) में जिस पर्व बेसब्री से इंतजार हो रहा है, वह है छठ पर्व (Chhath Parv) जो लोक आस्था का महापर्व है। यह परिवार की एकता और प्रकृति से एकाकार हो जाने का उत्सव है। इसमें जल-जंगल और जमीन के संरक्षण का संकल्प है और सबकी प्रगति का इच्छा है। 

महाआस्था के इस महापर्व में अब गिनती के ही दिन बाकी हैं। 8 नवंबर से शुरू होनवाले छठ महापर्व की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यह व्रत सबसे लंबा चलने वाला व्रत है। तकरीबन 36 घंटे तक चलने वाले इस व्रत में व्रती महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। इसकी शुरुआत 8 नवंबर से हो रही है और 11 नवंबर की सुबह यह व्रत समाप्त होगा। 

8 नवंबर  को नहाय- खाय से महापर्व छठ का शुभारंभ होगा। नहाय खाय के दिन पूरे घर की साफ- सफाई की जाती है फिर गंगाजल से पूरे घर को धोया जाता है, छठ के लिए पीतल के बर्तनों का ही उपयोग होता है।

उन्हें भी पवित्री मिट्टी और गंगाजल से धोया जाता है उसके बाद व्रती स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं। नहाय खाय पर चना दाल, कद्दू की सब्जी और चावल का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

नहाय-खाय के बाद अगले दिन यानी 9 नवंबर को व्रती खरना करेंगे। इस दिन व्रती चाहे महिला हो या पुरुष पूरे दिन व्रत रखते हैं। शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ वाली खीर, रोटी और फलों के प्रसाद को भगवान भास्कर और छठी मईया को भोग लगाया जाता है। व्रती इसी प्रसाद को ग्रहण करते हैं और अन्य लोगों में भी इस प्रसाद का वितरण किया जाता है। खरना के साथ ही व्रतियों का 36 घंटों का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है।

खरना का अगला दिन छठ व्रत के पहले अर्घ्य का होता है जो बेहद महत्वपूर्ण और कठिन होता है। इस दिन सुबह से ही घरों की साफ -सफाई होती है। एक-एक बर्तन, छठ के प्रसाद को ले जाने वाले दउरा को साफ किया ही जाता है साथ ही इनकी शुद्धता का भी बेहद सावधानी पूर्वक ख्याल रखा जाता है।

इसके साथ ही छठ में लोग अपनी हैसियत के अनुसार फलों और अन्य प्रसादों को बड़े ही समर्पित भाव से छठी मईया को अर्पित करते हैं। सभी फल और प्रसाद को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है।

छठ महापर्व में ठेकुआ और खजूर जैसे पारंपरिक पकवानों का अपना ही महत्व होता है। सबसे खास बात ये होती है कि जो महिलाएं छठ महापर्व में 36 घंटों के उपवास पर होती हैं वो भी पकावानों को बनाती हैं और महापर्व के अन्य कार्यों में घर की अन्य महिलाओं की मदद भी करती हैं। फिर शाम को गंगा नदी या अन्य नदी या फिर घर की छतों या तालाबों में व्रती अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देते हैं।

खरना के अगले दिन छठ का समापन किया जाता है। इस साल 11 नवंबर को इस महापर्व का समापन किया जाएगा। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले ही नदी या तालाब के पानी में उतर जाती हैं और सूर्यदेव से प्रार्थना करती हैं। इसके बाद उगते सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद पूजा का समापन कर व्रत का पारणा किया जाता है।