सिख इतिहास में दस गुरुओं के जीवन में ऐसे कई वाकये हुए हैं, जो हमें सिखाते हैं कि हमें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन से एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना हमें यह सिखाती है कि कैसे हमें दूसरों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए? उन्होंने उस समय के  अत्याचारी शासकों के खिलाफ युद्ध किया। 

उनके प्रिय शिष्य भाई कन्हैया थे, जिन्हें युद्ध के मैदान में घायल सिपाहियों को पानी पिलाने की सेवा दी गई थी। लेकिन भाई कन्हैया केवल अपनी तरफ के सिपाहियों को ही नहीं, बल्कि दुश्मनों के घायल सिपाहियों को भी पानी पिलाते थे। तो कुछ लोग गुरु गोविंद सिंह जी के पास गए और उन्होंने उनसे भाई कन्हैया के इस व्यवहार की शिकायत की। तब गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई कन्हैया से इसका जवाब पूछा तो भाई कन्हैया ने गुरु साहब को यह कहा कि, ‘मैं जहां भी आपकी ज्योति देखता हूं, मैं वहीं पानी पिला देता हूं।’ यह सुनकर गुरु गोविंद सिंह जी ने फरमाया कि यही एक ऐसा व्यक्ति है, जिसने मेरी शिक्षा को सही रूप में समझा और उस पर अमल किया। तब उन्होंने भाई कन्हैया को यह भी हुकुम दिया कि अब आगे से पानी ही नहीं, बल्कि उन सिपाहियों की मरहम-पट्टी भी किया करें।

न सिर्फ सिख इतिहास से, बल्कि सभी धर्म-ग्रंथों से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हम एक सदाचारी जीवन व्यतीत करें। सदाचारी जीवन की कुंजी ही हमारी आत्मा के सभी दरवाजों को खोल सकती है। सदाचारी जीवन का अर्थ यह है कि हम अपने जीवन में से अवगुणों को बाहर निकालेंऔर सद्गुणों को अपनाएं। अगर हमें भाई कन्हैया की तरह सभी जीवों में परमात्मा की ज्योति देखनी है, तो हमें सबसे प्रेम करना होगा और दूसरों के प्रति नम्रता, ईमानदारी और दया का भाव अपनेअंदर पैदा करना होगा। जीवन की किसी भी परिस्थिति में हों, दूसरों से मीठी जुबान में ही बात करें। दिल में मिठास लिए व्यवहार करें। यही परमात्मा की भी सेवा है। जैसे-जैसे हम रूहानियत में तरक्की करते हैं, तब हम हर प्राणी मात्र की और ज्यादा देखभाल और सेवा करने लग जाते हैं। हम हर एक में परमात्मा की ज्योति देखने लग जाते हैं। 

यह बहुत ही जरूरी है कि हम यह समझें कि प्रभु की शरण में जाने के लिए सदाचारी जीवन सिर्फ एक पहला कदम है। हममें से कई भाई-बहनों का यह भी खयाल होता है कि सदाचारी जीवन व्यतीत करना ही सब कुछ है, लेकिन संत-महापुरुष हमें समझाते हैं कि यह सिर्फ पहला कदम है। जैसे-जैसे हम अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करते हैं वैसे-वैसे हमारे कदम परमात्मा को जानने व उसको पाने की ओर बढ़ते चले जाते हैं। अगर हमारे हृदय में प्रभु को पाने की जरा सी भी दिली चाह और लगन है, तो प्रभु हमें कभी भी निराश नहीं होने देंगे। 

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज कहा करते थे कि प्रभु चींटी के दिल से निकली हुई प्रार्थना को पहले सुनता है और हाथी की चिंघाड़ को बाद में। प्रभु को पाने की इच्छा जिसके मन में है, उसकी रूह से निकलने वाली हर पुकार को परमात्मा अवश्य सुनता है और तब परमात्मा संतों-महापुरुषों को ऊंचे रूहानी मंडलों से इस धरा पर भेजते हैं। ताकि हम लोग, जो इस दुनिया की कुंठाओं में जकड़े हुए हैं, उनसे आजाद हों और प्रभु कार्य कर सकें। ऐसे महापुरुष हमारे ध्यान को बाहर से हटाकर अंतर्मुख करते हैं।  

गुरु गोविंद सिंह जी कहते थे कि प्रभु चींटी के दिल से निकली हुई प्रार्थना को पहले सुनता है और हाथी की चिंघाड़ को बाद में। प्रभु को पाने की इच्छा जिसके मन में है, उसकी रूह से निकलने वाली हर पुकार को परमात्मा अवश्य सुनता है और महापुरुषों को इस धरा पर भेजता है।