देवताओं में सर्वप्रथम पूजनिय देवता गणेश जी का सकट चौथ का व्रत बहुत ही खास है। इस व्रत को संकष्टी चतुर्थी, वक्रतुंडी चतुर्थी, माघी चौथ और तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है। इस व्रत में मां पार्वती के स्वरूप चौथ माता और उनके पुत्र श्री गणेश जी की पूजा की जाती है। सकट चौथ पर पूरे भारत देश में सिर्फ एक 'सकट चौथ माता के मंदिर' में पूजा की जाती है। वैसे तो घर पर भी कर ली जाती है लेकिन एक Sakat Chauth Temple है जो बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें लोग अपनी संतान के स्वास्थ्य और सफलता की कामना के लिए पूज करते हैं।

धोरा री धरोहर Rajasthan राज्य के अलवर जिले से करीब 60 किमी दूर Sakat नाम का गांव है। वहां  Sakat Chauth Mata का मंदिर है। राजस्थान सरकार के मुताबिक ये मंदिर तकरीबन 626 साल पुराना है। इस मंदिर परिसर में Ganesh ji और Lord Bhairav की मूर्तियां हैं। इसलिए चौथ के दिन यहां गणेश जी की विशेष पूजा होती है।

जैसे कि हम जानते हैं कि Sakat Chauth fast संतान की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। इसी के साथ राजस्थान के सवाईमधोपुर में सकट चौथ या तिलकुट चौथ के व्रत के दिन Chauth ka Barwada मंदिर हजारों की तादात में महिलाएं आती है और पूजा करती है व्रत कहानियां सुनती है। इस दिन यहां बड़ा मेला भी लगता है जो एक धार्मिक एहसास का सुख देने वाला होता है।
अलवर के सटक गांव में Sakat Chauth Temple का इतिहास-
मंदिर के मंदिर के शिलालेख से पता चलता है कि विक्रम संवत 626 साल पहले जयपुर के Maharaja Mansingh First ने Chauth Mata Temple  बनवाने के बाद सकट गांव बसाया था। पहले ये गांव मंदिर से करीब दो किलोमीटर दूर काली पहाड़ी की तलहटी में बसा था। इसके अवशेष आज भी मिलते हैं। सकट का नाम पहले गादरवाड़ा था।
गाय और चौथ माता का रहस्य-चौथ माता मंदिर गांव के स्थान से पहले हरा भरा जंगल था। पहले यहां गादरवाड़ा (Gadarwada) के लोग पशु चराते थे। यहां के लोगों का मानना है कि 600 साल पहले टीले पर लगे जाल के पेड़ के नीचे एक गाय आकर खड़ी हो जाती थी और उसके थन से अपने आप दूध की धारा जमीन के भीतर चली जाती थी। इसको एक ग्वाले ने देखा और वो उस गाय के साथ ही रहा। इसके बाद वो रोज देखता कि गाय उसी पेड़ के नीचे खड़ी हो जाती है और अपने आप दूध की धारा निकलने लगती है। इसके बाद वहां मंदिर बनाने की कवायद शुरू हो गई।1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर मौजूद मंदिर- माना जाता है चौथ माता की प्रतिमा सन 1332 के लगभग चौरू गांव में स्थित थी।
सन 1394 के आसपास बरवाड़ा में Maharaja Bhim Singh ने चौथ माता मंदिर बनवाया था, जो पंचाल के पास के गांव से चौथ माता की मूर्ति लाये थे। 1451 में मंदिर का जीर्णोद्घार किया गया था। जबकि मंदिर के रास्ते में बिजली की छतरी और तालाब 1463 में बनवाया गया। ये मंदिर करीब 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर मौजूद है।599 मंदिर की सीढ़ियां-शहर से 35 किमी दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह मंदिर जयपुर शहर के आसपास का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है। मंदिर सुंदर हरे वातावरण और घास के मैदान के बीच स्थित है। सफेद संगमरमर के पत्थरों से स्मारक की संरचना तैयार की गई है। दीवारों और छत पर शिलालेख के साथ यह वास्तुकला की परंपरागत राजपूताना शैली के लक्षणों को प्रकट करता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए 599 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। देवी की मूर्ति के अलावा, मंदिर परिसर में भगवान गणेश और भैरव की मूर्तियां भी दिखाई पड़ती हैं।
बूंदी राजघराने की है कि कुल देवी चौथ माता-यहां के लोग हर शुभ काम से पहले चौथ माता को निमंत्रण देते हैं। गहरी आस्था की वजह से बूंदी राजघराने के समय से ही इसे कुल देवी के रूप में पूजा जाता है। माता के नाम पर कोटा में चौथ माता बाजार भी है। कोई संतान पाने की इच्छा तो कोई अंखड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना लेकर चौथ माता के दर्शन को आता है। माना जाता है कि सभी की इच्छा पूरी होती हैं। चौथ माता मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में गांव वालों का कहना है कि चौथ माता को कुंवारी कन्या का रूप माना जाता है। साथ ही यहां कोई भी इंसान चौथ माता मंदिर के शिखर से ज्यादा ऊंचा मकान नहीं बनवाता है।