मस्ती, रंग, गुलाल, गुझिया और ठंडई की चाशनी में होली का रंग उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में चढ़ चुका है। खासकर भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा में तो होली के रसिया भक्त झूम रहे हैं। गुलाल और रंगों की बरसात हो रही है। श्रद्धालुओं में अपने आराध्य संग होली खेलने की होड़ लगी है। रामनगरी अयोध्या में इस बार की होली खास है। 

492 वर्ष बाद अपनी जन्मभूमि पर विराजे रामलला की होली में अद्भुत उमंग है। यहां इस बार की होली कहीं अधिक भव्यता के साथ मनाने की पूरी तैयारी है। भगवान भोले की नगरी काशी में भी हुड़दंग के साथ गलियों में रंगों की फुआर और गुलाल का रंग और चटक हो गया है।

होलिका दहन के साथ ही रंगोत्सव शुरू हो गया। इसी के साथ शुरू हो गया है एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर होली की बधाई का दौर। हालांकि फिर से बढ़ते कोरोना वायरस संक्रमण के आंकड़ों ने होली का रंग फीका जरूर कर दिया है। होली के पर्व पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को बधाई दी है। सीएम योगी ने कहा कि होली का पर्व हमें अधर्म, असत्य और अन्याय जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से लड़ने की प्रेरणा देता है।

 वृंदावन स्थित ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में रंगभरनी एकादशी से रंग बरस रहा है। श्रद्धालुओं में अपने आराध्य संग होली खेलने की होड़ लगी है। होली के रंग में सराबोर होकर श्रद्धालु ठाकुर जी की जय-जयकार कर रहे हैं। द्वारकाधीश मंदिर में रविवार को डोल महोत्सव के आयोजन के साथ होली के आयोजन हुए। 

बांके बिहारी मंदिर की ओर से भेजे गए रामलला को वस्त्र व गुलाल: होली पर गत वर्ष मथुरा और अयोध्या के बीच शुरू हुई परंपरा एक कदम और आगे बढ़ी है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर की ओर से इस बार होली के मौके पर रामलला समेत गर्भगृह में विराजमान सभी विग्रहों के श्रृंगार के लिए गुलाल के साथ वस्त्र भी भेजे गए हैं। 

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मभूमि से जुड़े मुकदमे का फैसला आने के बाद गत वर्ष बांके बिहारी मंदिर की ओर से होली के मौके पर भगवान राम को अर्पित करने के लिए गुलाल भेजा गया था। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस बार फिर बांके बिहारी मंदिर के पुजारी गोपी गोस्वामी की ओर से भगवान रामलला के लिए नीले रंग का वस्त्र तथा पीले रंग का गुलाल भेजा गया है। आध्यात्मिक महत्ता को देखें तो नीला रंग ठाकुर के सिर पर सजने वाले मोरपंख का प्रतिनिधित्व करता है तो पीला गुलाल भगवान कृष्ण के पीतांबर का प्रतिनिधि रंग है।

 रामनगरी अयोध्या में आराध्य को गुलाल अर्पित करने के साथ होली की शुरुआत होती है। मध्याह्न आराध्य को भांति-भांति के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। अपराह्न शयन के बाद भगवान को जगाए जाने के साथ उन्हें नई पोशाक धारण कराई जाती है और उन्हें करीने से गुलाल लगाया जाता है। तदुपरांत आराध्य के सम्मुख होली गीतों की महफिल सजती है। नगरी के हजारों मंदिरों में इस परंपरा का यथाशक्ति पालन होता है पर कनकभवन, मणिरामदासजी की छावनी, दशरथमहल बड़ास्थान, रामवल्लभाकुंज, लक्ष्मणकिला, रंगमहल, जानकीमहल, बिड़ला मंदिर, तिवारी मंदिर, नाका हनुमानगढ़ी आदि मंदिरों में इस परंपरा का पूरे भाव से पालन होता है।

बनारस का मिजाज और अंदाज निराला है। पर्व उत्सवों को मनाने की अदा भी आला है। कुछ ऐसे ही होलिका दहन से पहले होली बरात निकाली गई। बड़ी बाजार स्थित शीतला मंदिर से जब झांकियां निकलीं तो इसमें काशी की गंगा-जमुनी तहजीब नजर आई। सज्जित वाहन पर भोले बाबा और देवी पार्वती की झांकी और पीछे झूमते गाते भक्तों का रेला उमड़ पड़ा। 

दूल्हा-दुल्हन को लेकर निकली अलबेली बरात में होरी और फाग गूंजा। अबीर-गुलाल उड़ाए और मिल्लत का पैगाम लोग दिलों तक पहुंचाते नजर आए। होलिका की रात रविवार को ठाठ-बाट के साथ होली बरात निकाली गई। ढोल-तासा, नगाड़ा और बैंड-बाजा के साथ बरात और बाराती जिधर चले उधर होली की टोली भी हो-ली। हाथी-घोड़े से सुसज्जित बरात की जगह-जगह आतिशबाजी से अगवानी की गई।