फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से घरों में होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। होली से पहले के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। इन आठ दिनों के बीच कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। अगर इन दिनों कोई शुभ कार्य किया जाए तो उसका विपरीत परिणाम सामने आ सकता है। यह आठ दिन देवी-देवता की अराधना के लिए बहुत श्रेष्ठ माने जाते हैं। होलाष्टक के समय ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।  होलाष्टक में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से हर तरह के रोग से मुक्ति मिलती है। 

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होलाष्टक के दौरान 16 संस्कार सहित सभी शुभ कार्यों को रोक दिया जाता है। इन दिनों गृह प्रवेश करने की मनाही है। नवविवाहित युवतियों को ससुराल की पहली होली देखने की भी मनाही होती है। होलाष्टक के दौरान यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो अंतिम संस्कार के लिए भी शांति कराई जाती है। 

होलाष्टक के दौरान दान-पुण्य करने का विशेष फल प्राप्त होता है। इस दौरान अधिक से अधिक समय भगवत भजन और अनुष्ठान में व्यतीत करना चाहिए। होलाष्टक के दिनों में तीर्थ स्थान पर स्नान और दान का विशेष महत्व है। इन दिनों में किए गए दान से जीवन में आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। 

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इन दिनों अनुशासित दिनचर्या का पालन करें। होलाष्टक के दौरान गणेश वंदना बहुत फलदायी है। हनुमान चालीसा का पाठ करें। होलाष्टक के आठ दिनों में मन में उल्लास लाने के लिए लाल या गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें। होलाष्टक शुरू होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है। इस स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर इस स्थान पर होलिका दहन के लिए लकड़ियां एकत्र की जाती हैं। ऐसी लकड़ियां जो सूखने के कारण पेड़ों से टूटकर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर लिया जाता है। होलाष्टक आरंभ होने के साथ मौसम में बदलाव आना शुरू हो जाता है।