मथुरा। ब्रज के ऐतिहासिक बांकेबिहारी मन्दिर में 124वें आनन्द उत्सव की धूम मची हुई है। 18 मार्च से शुरू हुआ यह उत्सव एक अप्रैल तक चलेगा। मन्दिर को हर रोज नयी नवेली दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है, जिस प्रकार फूल बंगले में सजाया जाता है।मन्दिर की प्रबंध समिति के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय आनन्द किशोर गोस्वामी तो मन्दिर की सजावट स्वयं अपने हाथ से करते थे और प्राय: मन्दिर को सजाने में उनकी रात बीत जाती थी। इसके लिए देश में उपलब्ध फूलों के साथ ही विदेशों से भी फूल मंगाकर वे स्वयं श्रंगार करते थे लेकिन अदालत द्वारा फूलों की सजावट में रोक लग जाने के कारण अब मन्दिर को गुब्बारे आदि से ही सजाया जाता हैं तथा ठाकुर को अरोगने के लिए रोज उन्हें नाना प्रकार के व्यंजन अर्पित किये जा रहे हैं। 

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साधुओं और संतों को रोज ठाकुर का राजभोग प्रसाद दिया जा रहा है इसकी मात्रा इतनी अधिक होती है कि हर संत का न केवल पेट भर जाय बल्कि उसके शाम के कलेऊ की भी व्यवस्था हो जाय। देहरी पूजन इस उत्सव की सबसे अधिक महत्वपूर्ण सेवा है।मन्दिर के राजभोग सेवा अधिकारी ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी ने बताया कि देहरी पूजन द्वापर में मां यशोदा ने उस समय किया था जब कान्हा 'घुटुवन' यानी घुटनोंके बल चलने लगे थे। उन्हें डर था कि देहरी को पार करते समय कान्हा को कहीं चोट न लग जाय इसलिए उन्होंने विधि विधान से देहरी का पूजन किया था। उन्होंने बताया कि देहरी पूजन में पहले देहरी का पंचामृत अभिषेक होता है। 

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उसके बाद देहरी को एक दर्जन से अधिक गुलाब जल से भरी केन से धोया जाता है तथा 108 इत्र की शीशियों में भरे इत्र से मन्दिर के जगमोहन के कपाट तथा कटघरे को आच्छादित किया जाता है। 11 या 21 अथवा 31 कलश का पूजन किया जाता है तथा एक मन से अधिक गुलाब एवं विदेशी पुष्पों को ठाकुर को अर्पित किया जाता है । ठाकुर को बालभोग के साथ नाना प्रकार की मिठाइयां, सूखे मेवे , नाना प्रकार के फल के साथ साथ पोशाक, उनके जाड़े और गर्मी के बिस्तर आदि अर्पित किये जाते है। लगभग दो घंटे तक वैदिकमंत्रों के चल रहे पाठ के साथ ही देहरी पूजन होता है और देहरी पूजन का समापन भक्तों द्व़ारा मन्दिर की परिक्रमा से होता है। 

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मन्दिर के कपाट खुलने के साथ ही श्रंगार आरती होती है। ठाकुर के श्रंगार में आभूषणों एवं अति सुन्दर पोशाक का अर्पण महत्वपूर्ण है। देहरी पूजन की व्यवस्था अगले दिन दूसरे भक्त को मिल जाती है और वह भी ठाकुर को अति उत्तम प्रसाद, पोशाक और आभूषण आदि अर्पित करता है। सेवा करानेवाला भक्त दोपहर को ठाकुर के राजभोग की व्यवस्था करता है जिसमें अधिक से अधिक व्यंजनों का समावेश होता है। राजभोग आरती के पहले भक्तों में प्रसादस्वरूप फल एवं वस्त्र लुटाए जाते हैं।उनका कहना था कि जो भक्त 'तेरा तुझकों अर्पण क्या लागे मेरा' के भाव से राजभोग की सम्पूर्ण सेवा कराता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है क्योंकि बिहारी जी महराज तो भाव के भूखे हैं। राजभोग सेवायत आचार्य के अनुसार देहरी पूजन के बाद यज्ञशाला में नित्य पांच घंटे तक यज्ञ होता है तथा उस दिन की राजभोग सेवा भक्तों में सामूहिक प्रसाद वितरण से होती है।कुल मिलाकर मन्दिर में वर्तमान में भक्ति रस की गंगा प्रवाहित हो रही है।