शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन दुर्गा पूजा और दशहरा के अवसर पर बंगाली समुदाय की महिलाएं मां दुर्गा की बहुत ही विधि विधान से पूजा करती है। दुर्गा पुजा पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार हैं। यहां मां दुर्गा को महिलाएं सिंदूर अर्पित करती हैं, इसे सिंदूर खेला के नाम से जाना जाता है। जिस तरह से होली कई रंगों से खेली जाती है ठीक वैसे ही सिंदूर खेला खेली जाती है।  

दशहरा के दिन पंडाल में मौजूद सभी सुहागन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह खास उत्सव मां की विदाई के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि में 9 दिनों के लिए मां दुर्गा धरती पर आती है और कई रूपों में अवतार लेती है। इस 9 दिनों में मां की अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। 10वें दिन मां की विदाई की जाती है और इसी उपलक्ष्य में सिंदूर खेला की रस्म की जाती है।

सिंदूर खेला की बहुत खास बातें है जो जाननी बहुत ही जरूरी होती है। सिंदूर खेला के दिन पान के पत्तों से मां दुर्गा के गालों को स्पर्श करते हुए उनकी मांग और माथे पर सिंदूर लगाकर महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं। इसके बाद मां को पान और मिठाई का भोग लगाती है। धुनुची नृत्यक की परंपरा इस दिन खास होती है क्योंकि सिंदूर खेला के दिन बंगाली समुदाय में धुनुची नृत्यी करते हैं जिससे मां दुर्गा प्रसन्न होती है।