पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद में चौगामा क्षेत्र के कान्हड़ गांव में स्थित करीब 500 साल पुराना दुर्गा मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक बना हुआ। चौगामा क्षेत्र के दाहा तथा कान्हड़ गांव के बीच बड़ौत-बुढ़ाना मार्ग स्थित दुर्गा मन्दिर की स्थापना कान्हड़ गांव निवासी बहादुर गिरी ने मुस्लिम हुकुमत के दौरान मीर अली नवाब पीछोकरा निवासी से मन्दिर स्थापित कराने के लिए जमीन को दान में लिया था। उन्होंने मन्दिर के लिए करीब 12 बीघा जमीन दी थी, जिसमें बहादुर गिरी ने क्षेत्र में घुम-घुमकर चंदा इकट्ठा कर इस मन्दिर का निर्माण कार्य कराकर दुर्गा माता की मूर्ति स्थापित करायी थी।

बताते हैं कि किसी जमाने में एक व्यक्ति ने अपनी पुत्री का विवाह कि इस दौरान उसकी पुत्री ने अपने पिता को डोली में बैठते हुए कहा था कि तुमने जहां पर मेरी शादी की है। वहां पर तो देवी का मेला भी नहीं लगता है, तब पिता ने उसकी गोद में दुर्गा माता की की मूर्ति रखी थी। उसके बाद दोघट थाना क्षेत्र के बोपुरा गांव में एक वर्ष तक मेला भरा था। जहां पर ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे।

बताया जाता है कि एक बार बहादुर गिरी घोड़े पर सवार होकर दुर्गा माता की मूर्ति को उठा लिया था। उसके बाद वह उस मूर्ति को उठाकर टीकरी कस्बे के निकट प्याऊ पर पहुंचा दिया था। जहां पर मूर्ति स्थापित कराने का निर्णय लिया। बाद में मां दुर्गा की मूर्ति की पूजा अर्चना हुई। वहीं पर मेला शुरू हो गया। बहादुर गिरी ने गांव  के नबाब मीर अली के पास पहुंचे और मूर्ति तथा मन्दिर निर्माण के लिए जमीन दान में मांगी थी। जिस पर खुश होकर उन्हीने करीब 12 बीघे जमीन मन्दिर के नाम भेंट कर दी थी। तब से इस मन्दिर पर चैत्र नवरात्रों में प्रतिवर्ष भव्य मेला लगता आ रहा है।

बागपत के बड़ौत में आयोजित मेले में हरियाणा ,पंजाब, दिल्ली आदि स्थानों से श्रदालु माता दुर्गा के दर्शन करने आते है। मन्दिर में हनुमान, माँ दुर्गा ,काली माता, शनिदेव आदि की मूर्तिया स्थापित है। फरियादियो की मनोकामना पूर्ण होती है।

प्राचीन मन्दिर में आने वाला दान सभी मन्दिर निर्माण कार्य में खर्च कर दिया जाता है। शासन- प्रशासन से कोई मदद मंदिर के लिए नहीं मिलती। मंदिर के पुजारी कंवरपाल गिरी ने बताया कि दानदाताओं के सहारे ही मंदिर का जीणोद्धार होता है। मंदिर पुजारी का कहना कि सिर्फ दान के सहारे ही मंदिर का रख रखाव होता है।