महाशिवरात्रि का त्योहार आने वाला है। शिव जी की सबसे लंबी रात को महाशिवरात्रि कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार Mahashivratri 2022 की रात जागरण करने के महादेव  की महाआर्शिवाद प्राप्त होता है। महाशिवरात्रि से पहले गंगा की तरह पावन नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग को नर्मदेश्वर कहा गया है।


यह घर में भी स्थापित किए जाने वाला पवित्र और चमत्कारी शिवलिंग है, जिसकी पूजा शास्त्रों में अत्यन्त फलदायी कही गई है। यह साक्षात शिवस्वरूप, सिद्ध व स्वयंभू (जो भक्तों के कल्याण के लिए स्वयं प्रकट हुए हैं) शिवलिंग है। इसको वाणलिंग भी कहते हैं।

नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व-शास्त्रों में कहा गया है कि मिट्टी या पाषाण से करोड़ गुना अधिक फल स्वर्ण निर्मित शिवलिंग के पूजन से मिलता है। स्वर्ण से करोड़ गुना अधिक मणि और मणि से करोड़ गुना अधिक फल बाणलिंग Narmadeshwar Shivling के पूजन से प्राप्त होता है। घर में इस शिवलिंग को स्थापित करते समय प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। गृहस्थ लोगों को नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए, क्योंकि यह परिवार का मंगल करने वाला,समस्त सिद्धियों व स्थिर लक्ष्मी को देने वाला शिवलिंग है। सामान्यत:शिवलिंग पर चढ़ी कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं की जाती,परन्तु नर्मदेश्वर शिवलिंग का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

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नर्मदा नदी का हर पत्थर शिवलिंग-स्कन्दपुराण के अनुसार एक बार भगवान Shiv ने देवी Parvati ji को भगवान विष्णु के शयनकाल (चातुर्मास)में द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करते हुए तप करने के लिए कहा। पार्वती जी शंकरजी से आज्ञा लेकर चातुर्मास शुरू होने पर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने लगीं।
Parvati ji के तपस्या में लीन होने पर शंकर भगवान पृथ्वी पर विचरण करने लगे। भगवान शिव यमुना के किनारे हाथ में डमरु लिए,माथे पर त्रिपुण्ड लगाए,बढ़ी हुईं जटाओं के साथ मनोहर दिगम्बर रूप में मुनियों के घरों में घूमते हुए नृत्य कर रहे थे। कभी वे गीत गाते,कभी मौज में नृत्य करते थे तो कभी हंसते थे,कभी क्रोध करते और कभी मौन हो जाते थे। उनके इस सुन्दर रूप पर मुग्ध होकर बहुत-सी मुनि पत्नियां भी उनके साथ नृत्य करने लगीं।

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मुनिजन शिव को इस वेष में पहचान नहीं सके बल्कि उन पर क्रोध करने लगे। मुनियों ने क्रोध में आकर शिव को शाप दे दिया कि तुम लिंगरूप हो जाओ। शिवजी वहां से अदृश्य हो गए। उनका लिंगरूप अमरकण्टक पर्वत के रूप में प्रकट हुआ और वहां से Narmada नदी प्रकट हुईं और शिव की स्तुति की।
तब शिवजी ने वरदान दिया कि हे ’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे और तुम्हारे दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण हो जाएगा। यह वरदान पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है–‘नर्मदा का हर कंकर शंकर है।  इस कारण Narmada में जितने पत्थर हैं, वे सब शिवरूप हैं।


(यह आलेख सिर्फ जनरुचि के लिए हैं, यह आलेख इन सब का दावा नहीं करता है। यह लौकिक मान्यता आधारित है।)