होली का त्योहार बीतने के बाद और गर्मी शुरू होने से ठीक पहले का समय शीत और ऊष्ण का होता है, इसी दौरान माता शीतला का पूजन किया जाता है। चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की सप्तमी-अष्टमी को माता शीतला का त्योहार मनाया जाता है। माता शीतला को मां दुर्गा और मां पार्वती का रूप माना जाता है। माता शीतला की पूजा से रोग और व्याधियां दूर हो जाते हैं। माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए ठंडा बासी भोजन किया जाता है। माता शीतला की उपासना मानसिक विकारों को दूर करती है।

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पौराणिक कथा के अनुसार माता शीतला की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा से हुई। मां शीतला अपने हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। कुछ लोग शताक्षी देवी को भी मां शीतला कहकर संबोधित करते हैं। स्कंद पुराण में मां शीतला की अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है।

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 माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शिव ने की थी। मां शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। शीतला सप्तमी को भोजन बनाकर रखा जाता है और दूसरे दिन उसी भोजन को खाया जाता है। मान्यता है कि मां शीतला की उपासना से चेचक का रोग ठीक हो जाता है। माता शीतला की उपासना से रोगों से रक्षा होती है। त्वचा संबंधित रोग दूर होते हैं।