हिन्दू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से बहुत ही ज्यादा गहरा नाता रहा है। हिन्दू देवी और देवताओं के पास एक एक वाद्य यंत्र  है जिसे वे समय समय पर बजाकर संगीत के सुर उत्पन्न करते रहते हैं। ऐसे ही 8 वाद्य यंत्र है जो मंदिरों में भजन कीर्तन में बजाए जाते हैं- 

घंटीः- घंटी से निकलने वाला स्वर नाद का प्रतीक है जो भगवान को अति प्रिय है। यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है। घंटी या घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है। ऐसा माना जाता है कि जब प्रलय काल आएगा, तब भी इसी प्रकार का नाद यानी आवाज प्रकट होगी।

शंखः- शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त 14 अनमोल रत्नों में से एक है। शंख कई प्रकार के होते हैं। इसका स्वर भी भगवान को अति प्रिय है।

मंजीराः- इसे झांझ, तला, मंजीरा, कफी आदि नामों से भी जाना जाता है। भजन-कीर्तन के समय इसका उपयोग किया जाता है।

करतलः- इसे खड़ताल भी कहते हैं। इस वाद्य यंत्र को आपने नारद मुनि के चित्र में उनके हाथों में देखा होगा। यह भी भजन और कीर्तन में उपयोग किया जाना वाला यंत्र है।

ढोलः-  ढोलक कई प्रकार के होते हैं। अक्सर इन्हें मांगलिक कार्यों के दौरान बजाया जाता है। यह भी भजन और कीर्तन में उपयोग किया जाना वाला यंत्र है।

नगाड़ाः- नगाड़ा प्राचीन समय से ही प्रमुख वाद्य यंत्र रहा है। इसे बजाने के लिए लकड़ी की डंडियों से पीटकर ध्वनि निकाली जाती है। इसका उपयोग लोक उत्सवों, भजन-कीर्तन आरती आदि के अवसर पर भी किया जाना लगा। इसे दुंदुभी भी कहा जाता है।

मृदंगः- यह दक्षिण भारत का एक थाप यंत्र है। बहुत ही मधुर आवाज के इस यंत्र का इस्तेमाल गांवों में कीर्तन गीत गाने के दौरान किया जाता है। अधिकतर आदिवासी इलाके में ढोल के साथ मृदंग का उपयोग भी होता है।

डमरूः-  डमरू या डुगडुगी एक छोटा संगीत वाद्य यंत्र होता है। डमरू का हिन्दू, तिब्बती व बौद्ध धर्म में बहुत महत्व माना गया है। भगवान शंकर के हाथों में डमरू को दर्शाया गया है। भजन-कीर्तन में इसका उपयोग होता है।