सनातन धर्म की मान्यता है कि ‘यत् पिंड तत् ब्रह्मांडं’ अर्थात् मानव शरीर पर तथा पृथ्वी के समस्त जीव-वनस्पतियों तथा प्राकृतिक संसाधनों पर आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता ही पड़ता है। इस संवत्सर में वर्षेश मंगल बहुत ही शक्तिशाली होने के कारण अनिष्टकारी बन गया है। यही कारण है कि संवत्सर के प्रथम ढाई महीनों तक इसका दुष्प्रभाव सर्वाधिक है। 

 ज्योतिषीय गणना के आधार पर उन्होंने दावा किया है कि मई के दूसरे पखवारे से ग्रहीय प्रकोप कम होगा और भारत को कोरोना के प्रकोप से राहत मिलनी शुरू हो जाएगी। उन्होंने कहा कि महावीर पंचांग के लिए वर्षफल तैयार करते समय ही मैं बहुत सशंकित एवं भयभीत था। ग्रहीय मंत्रिमंडल के दस पदों में से राजा सहित चार पदों (राजा मंगल, मंत्री मंगल, दुर्गेश मंगल, मेघेश मंगल) पर चराचर मंगल का आधिपत्य इस शंका और भय का कारण बना। 

मंगलवार की मेष संक्रांति, मंगलवार की पूर्णिमा एवं मंगलवार की आगामी अमावस्या एक विशेष प्रकार का कुयोग बना रही हैं, जिसे शास्त्रों में रक्पर योग का नाम दिया गया है। आगामी 14 मई तक सूर्य मेष राशि में संचरण करेगा। यह सूर्य की उच्च राशि और मंगल का घर है। इस प्रकार 14 मई के बाद से इस कुयोग का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगेगा।

इसी तिथि पर सूर्य संक्रमिता फल एक माह तक अधिक होता है। इसलिए 14 अप्रैल के बाद 14 मई तक का समय विशेष रूप से कष्टकारी है। दोवोपासक चिकित्सा के अंतर्गत यज्ञ और होमादि करने से वातावरण शुद्ध होगा तथा महामारी का दुष्प्रभाव न्यूनतम रह जाएगा।