शहरी लोग इंजीनिंयर द्वारा बनाए गए फ्लैट में रहना पसंद करते हैं। इन घरों में किसी तरह का कोई वास्तु नहीं होता है। इसलिए लोग यहां कम ही टीक पाते हैं। घर में आंगन और दिवारों का खूबसूरत होना जरूरी होता है। इसी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों में ही अब कुछ घर ऐसे बचे हैं जहां आंगन है। आंगन वाला घर बनाना चाहते हैं या कि आपके यहां आंगन है तो जान लो उसका वास्तु।

आंगन बिना घर अधूरा है। घर के आगे और घर के पीछे छोटा ही सही, पर आंगन होना अच्छा माना जाता है। प्राचीन हिन्दू घरों में तो बड़े-बड़े आंगन बनते थे। शहरीकरण के चलते आंगन अब नहीं रहे। आंगन घर में तीन तरह से होते हैं-

पहला घर के सामने आंगन,
दूसरे घर के पीछे आंगन
तीसरा घर के आगे

पीछे दोनों ओर आंगन और चौथा घर के बीचोंबीच आंगन और चारों ओर घर। सभी तरह के आंगन का वास्तु अलग अलग होता है। वास्तु के हिसाब से घर का आंगन होना ही चाहिए। आंगन घर और बाहर के बीच विभाजक का कार्य करता है। घर की बात घर में ही रखें उसे आंगन तक भी ना ले जाएं।