होली के त्योहार से पहले होलाष्टक मनाया जाता है। यह होली के 8 दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। इसलिए इसको होलाष्टक कहा जाता है। यह कल 10 मार्च से आरंभ हो चुका है और 17 मार्च को Holika Dahan तक रहेगा। बताया जाता है कि होलाष्टक के 8 दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। यह अपशगुन और अशुभ माना जात हैं।

होलाष्टक कथा

कामदेव की कथा


कामदेव ने देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव को उनके तप से ध्यान भंग करने के लिए उन पर पुष्पबाण से प्रहार किया था। कामदेव के पुष्प बाण से कोई घायल नहीं होता है, उसके अंदर प्रेम और काम का प्रवाह होता है। कामदेव के इस प्रयास से महादेव का ध्यान तो भंग हो गया, लेकिन कामदेव को उनके प्रचंड क्रोध का भागी बनना पड़ा।


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भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र को खोलकर भस्म कर दिया। कहा जाता है कि उस दिन फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि थी। उस ​दिन से कामदेव अनंग हो गए। उनकी पत्नी देवी रति के निवेदन पर भगवान शिव ने उनको द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रुप में दोबारा शरीर प्राप्त करने का वरदान दिया। तब तक कामदेव सृष्टि में एक भाव रुप में व्याप्त रहे। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को कामदेव के भस्म होने के कारण यह दिन अशुभ माना जाने लगा।

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भक्त प्रह्लाद की कथा

राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त थे। यह बात उनके पिता को पसंद नहीं थी। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को विरोधी और स्वयं को भगवान मानता था। उसने कह रखा था कि उसके राज्य में केवल उसकी ही पूजा होगी, किसी अन्य की पूजा करना अपराध होगा।
उसके आदेश को उसके पुत्र प्रह्लाद से ही चुनौती मिल रही थी। उसने बार-बार प्रह्लाद को भगवान विष्णु की पूजा करने से मना किया, लेकिन प्रह्लाद श्रीहरि की भक्ति में और भी लीन होते गए। हिरण्यकश्यप के मन में प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से असुरक्षा और घमंड ने घर कर लिया।
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि से उसने भक्त प्रह्लाद को कई प्रकार की यातनाएं देनी शुरु की, ताकि वह विष्णु भक्ति से विमुख हो जाएं लेकिन उनकी भक्ति और प्रगाढ़ होती गई। भक्त प्रह्लाद को कभी पहाड़ से नीचे फेंका गया, तो कभी हाथी के पैरों से कुचल कर मारने का प्रयास हुआ लेकिन विष्णु कृपा से वे हर बार बच गए।