गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा के माध्यम से हनुमानजी के बल, बुद्धि व पराक्रम का वर्णन किया है। हनुमान चालीसा की अनेक चौपाइयों में हमारी समस्याओं का समाधान भी छिपा हुआ है।

उज्जैन. इन चौपाइयों का प्रत्येक आदमी के जीवन में मत्वपूर्ण योगदान है। इन चौपाइयों का जाप हनुमान जयंती पर करने से आपकी हर परेशानी का समाधान हो सकता है। प्रत्येक शनिवार को भी अगर इन चौपाइयों का जाप करेंगे तो आपकी हर मनोकामना पूर्ण होगी। 

श्री सालासर बालाजी धाम मंदिर

1. विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर

लाभ- गरीबी और दुर्भाग्य खत्म कर अच्छी विद्या और सुखी जीवन की प्राप्ति के लिए इस चौपाई का जाप करना चाहिए।

2. बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहिं। हरहु कलेश विकार।।

लाभ- इस चौपाई का जाप करने से सभी प्रकार के दुख दूर होते हैं और बल, बुद्धि व विद्या यानी ज्ञान की प्राप्ति होती है।

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3. संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमान बलबीरा।।

लाभ- जब भी जीवन में विकट परिस्थियों का सामना हो तो हनुमान चालीसा की इस चौपाई का जाप करने से सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है।

4. भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै

लाभ- इस चौपाई का जाप करने से किसी प्रकार की बुरी शक्ति का असर आप पर नहीं होता या आपके आस-पास कोई नेगेटिव एनर्जी है तो आपसे दूर ही रहती है।

5. नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा

लाभ- यह चौपाई बीमारियों के लिए यह रामबाण उपाय साबित होती है। इसके अलावा इसके जाप से रुके हुए काम भी जल्दी होने लगते हैं।

6. भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचंद्र के काज संवारे

लाभ- इस चौपाई का जाप करने से व्यक्ति के सभी बिगड़े काम बनने लगते हैं। साथ ही घर-परिवार का आर्थिक परेशानियां खत्म होती है।

7. सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रच्छक काहू को डर ना

लाभ- जो भी व्यक्ति हनुमान चालीसा की इस चौपाई का जाप करता है, उसे जीवन का हर सुख प्राप्त होता है और हनुमानजी की कृपा भी उस पर बनी रहती है।

॥ श्री हनुमान चालीसा ॥

॥ दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज

निज मनु मुकुरु सुधारि ।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु

जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके

सुमिरौं पवन-कुमार ।

बल बुधि बिद्या देहु मोहिं

हरहु कलेस बिकार ॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।

कुमति निवार सुमति के संगी ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।

कानन कुण्डल कुँचित केसा ॥४

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै ।

काँधे मूँज जनेउ साजै ॥

शंकर सुवन केसरी नंदन ।

तेज प्रताप महा जगवंदन ॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।

राम काज करिबे को आतुर ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।

राम लखन सीता मन बसिया ॥८

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।

बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।

रामचन्द्र के काज सँवारे ॥

लाय सजीवन लखन जियाए ।

श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।

नारद सारद सहित अहीसा ॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।

कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।

राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।

लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥

जुग सहस्त्र जोजन पर भानु ।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥२०

राम दुआरे तुम रखवारे ।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।

तुम रक्षक काहू को डरना ॥

आपन तेज सम्हारो आपै ।

तीनों लोक हाँक तै काँपै ॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।

महावीर जब नाम सुनावै ॥२४

नासै रोग हरै सब पीरा ।

जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

संकट तै हनुमान छुडावै ।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।

तिनके काज सकल तुम साजा ॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।

सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८

चारों जुग परताप तुम्हारा ।

है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।

असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।

अस बर दीन जानकी माता ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा ।

सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२

तुम्हरे भजन राम को पावै ।

जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

अंतकाल रघुवरपुर जाई ।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

और देवता चित्त ना धरई ।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा ।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६

जै जै जै हनुमान गोसाईं ।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।

छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।

होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।

कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥४०

॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन,

मंगल मूरति रूप ।

राम लखन सीता सहित,

हृदय बसहु सुर भूप ॥