अगर किसी को भी अपने घर और गांव को साफ रखना सीखना है तो उसे असम के एक छोटे से गांव से सीखना चाहिए। यहां केवल सफाई ही नहीं है बल्कि सुंदरता का छटा बिखरती है। इस गांव से आम नागरिक के साथ-साथ सरकारें भी सीख ले सकती हैं। दरअसल, हम बात असम के गोलपारा जिले के एक गांव रांसापारा की कर रहे हैं, जहां पिछले 20 सालों से ग्रामीण स्वच्छता अभियान चला रहे हैं।

रांसापारा स्वच्छता और सामुदायिक भागीदारी का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहां स्वच्छता मिशन में भाग नहीं लेने पर पुरुषों के लिए 30 रुपये और महिलाओं के लिए 20 रुपये का एक छोटा जुर्माना रखा गया है। आश्चर्य की बात यह है कि अभी तक किसी भी ग्रामीण को जुर्माना नहीं भरना पड़ा है क्योंकि वे सफाई अभियान में अनुपस्थित नहीं रहे हैं।

मिली जानकारी के अनुसार, रांसापारा में सफाई अभियान सप्ताह में दो बार आयोजित किया जाता है। इसमें पुरुष बुधवार को और शनिवार को महिलाएं भाग लेती हैं। गांव में 92 परिवार रहते हैं। इसे 2016-17 में राज्य सरकार की ओर से ‘असम का सबसे स्वच्छ गांव’ घोषित किया गया था और इसके निवासियों को 5 लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया था।

गांव के मुखिया रॉबर्ट जॉन मोमिन ईस्टमोज़ो का कहना है कि उन्होंने कभी भी सबसे साफ गांव होने का नहीं सोचा था, लेकिन अपने आंगन और गांव को साफ रखना हमारी दैनिक गतिविधि का एक हिस्सा था। इस बीच युवाओं ने गांव के सौंदर्यीकरण के लिए भी काम किया। हमें कभी किसी को दंड देने का मौका नहीं मिला क्योंकि हर कोई खुशी-खुशी अभियान में भाग लेता है।

वहीं, मणिपुर के उखरूल के पहाड़ी शहर को सुंदर बनाने के लिए SALIS (लैटिन में ’नमक’) नाम से कलाकारों की एक टीम अभियान चला रही है। कलाकार पूरे शहर के विभिन्न स्थानों पर आकर्षक चित्र बना रहे हैं। टीम की अगुवाई करने वाले सोरिन्थन होरेई का कहना है कि SALIS का विचार युवा कलाकारों को बढ़ावा देना है और उनकी प्रतिभा और कौशल के माध्यम से शहर और समुदाय में योगदान करना है। उनका कहना है कि उन्हें अपने शहर की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। उनका पहला प्रोजेक्ट व्यूलैंड बैपटिस्ट चर्च में था, जिसमें एंजिल विंग्ड वाली कला थी। दूसरा प्रोजेक्ट एक बस स्टैंड का था, वहां का उद्देश्य एक सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देना और संरक्षित करना था।