ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसे दुनिया के सबसे बड़े द्वीप माजुली को आप असम की सांस्कृतिक राजधानी कह सकते हैं। माजुली में मुखौटा बनाने की कला बेहद पुरानी है। वैष्णव संत शंकरदेव और माधवदेव ने कई नाटक लिखे हैं। इन नाटकों में अभिनव करने के लिए माजुली के मुखौटों का सहारा लिया जाता है। जल्‍द ही भारत के नॉर्थ ईस्‍ट के अहम राज्‍य असम में भी विधानसभा चुनावों का आगाज हो जाएगा। असम देश का वो हिस्‍सा है जहां पर आपको कई वीरों की गाथाएं तो सुनने को मिलेंगी। यहां पर हर कदम पर आपको कला और संस्‍कृति का बेजोड़ संगम भी देखने को मिलेगा।

इस राज्‍य के हर हिस्‍से में संस्‍कृति और कला बिखरी पड़ी है। ऐसी ही एक जगह है माजुली द्वीप जो दुनिया पहला सबसे बड़ा द्वीप है जो नदी पर है। माजुली की खासियत सिर्फ यहीं पर आकर नहीं सिमट जाती है बल्कि यह द्वीप मुखौटा बनाने की कला के लिए भी पूरी दुनिया में मशहूर है। माजुली में प्राकृतिक पदार्थों से तैयार मुखौटों ने अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। यहां पर आपको देवी, देवताओं से लेकर राक्षस और दैत्‍य तक के मुखौटे आसानी से मिल जाएंगे। भारत की पौराणिक कथाओं में जितने भी कैरेक्‍टर्स हैं, उन सभी के मुखौटे यहां पर आपको मिलेंगे।

ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बसे दुनिया के सबसे बड़े द्वीप माजुली को आप असम की सांस्कृतिक राजधानी कह सकते हैं। माजुली में मुखौटा बनाने की कला बेहद पुरानी है। वैष्णव संत शंकरदेव और माधवदेव ने कई नाटक लिखे हैं। इन नाटकों में अभिनव करने के लिए माजुली के मुखौटों का सहारा लिया जाता है। इन मुखौटों को बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। सबसे पहले जिस पात्र का भी मुखौटा बनाना होता है उसका बांस की महिम पट्टियों से खांचा तैयार किया जाता है। दूसरे चरण में इस खांचे के ऊपर मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। इसमें कार्डबोर्ड और गाय के गोबर का भी इस्तेमाल होता है। एक मुखौटा कम से कम तीन दिनों में तैयार होता है। तैयार मुखौटे को उसकी जरूरत के हिसाब से अगल-अलग रंगों में पेंट भी किया जाता है।

मुखौटा बनाने के लिए कई चरणों में काम बंटा होता है और इसे मिट्टी, गोबर, कपड़ा, रंग इत्यादि से तैयार किया जाता है। इसे तैयार करने के लिए ऑर्गेनिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। माजुली में तीन तरह के मुखौटे तैयार किए जाते हैं। ‘बड़ा मुख’ यानी जो शरीर के आकार का होता है।’लोतोकाइमुखा’ यानी जिसकी आंखें और जीभ हिल सकती हैं। आखिरी है ‘मुखमुखा’ यानी मुंह के आकार का मुखौटा। माजुली में मुखौटा बनाने की यह कला आज पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मुखौटों की यह कला महान संत शंकरदेव की ही देन है। वैष्णव परम्परा में बदलाव की लहर लाने वाले शंकरदेव ने रामायण, महाभारत और श्रीकृष्ण से जुड़ी कहानियों को कहनें के लिए रंगमंच की कला का प्रयोग किया जिसे उन्होंने ‘भावोना’ कहा। इसके लिए उन्होंने मुखौटों का इस्तेमाल करना शुरू किया।