असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा उग्रवादी संगठन उल्फा (आई) को चर्चा की मेज पर लाने और शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी बीच संगठन ने ऐलान किया है कि इस बार वह आने वाला स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार नहीं करेंगे। 1996 के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब संगठन ने स्वतंत्रता दिवस का बायकॉट नहीं किया है।

हालांकि संगठन ने मुख्यमंत्री के शांति प्रयासों का उल्लेख नहीं किया है। उल्फा (आई) के नेता परेश बरुआ ने सीएम पर अपना विश्वास व्यक्त किया और मई में युद्धविराम की घोषणा की। अब उन्होंने कहा कि इस वर्ष वह कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता दिवस पर कोई बंद का आह्वान नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोविड -19 महामारी के कारण लोग पहले से ही परेशान हैं।

उल्फा का कहना है, 'हम इस साल कोई भी बंद का ऐलान नहीं कर रहे हैं लेकिन हम लोगों से लोकतांत्रिक तरीके से और कोविड -19 प्रोटोकॉल का पालन करके अपना विरोध दर्ज कराने की अपील करते हैं।' संगठन का कहना है कि असम औपनिवेशिक भारत का कभी हिस्सा नहीं था।

असम में सक्रिय उग्रवादी संगठन कहा कि यंदाबू की संधि के तहत 24 फरवरी, 1826 को ईस्ट इंडिया कंपनी और बर्मा के बीच समझौता साइन किया गया था। इसमें कहा गया था कि दोनों ने असम की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया और इसे ब्रिटिश भारत में स्थानांतरित नहीं किया गया। उल्फा (आई) ने कहा कि वह ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखकर और संगठन के उद्देश्य के अनुरूप असम की संप्रभुता पर चर्चा के लिए तैयार है।

संगठन की ओर से कहा गया कि उल्फा (आई) न तो बातचीत के खिलाफ है और न ही हिंसा के समर्थन में है, लेकिन हम बातचीत के लिए ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकते। भारत सरकार का कहना है कि उल्फा (आई) के साथ संप्रभुता पर चर्चा करना असंभव है। लेकिन, हम जानते हैं कि यह संभव है। भारत सरकार चर्चा का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संविधान में संशोधन कर सकती है। भारत सरकार ने संविधान में कई बार संशोधन किया है तो भारत इसमें फिर से संशोधन क्यों नहीं कर सकता और हमारे साथ चर्चा क्यों नहीं कर सकता?

यंदाबू की संधि का हवाला देते हुए, संगठन ने कहा, 'संधि के दूसरे लेख के अनुसार, बर्मा और ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया था, और राज्य को ब्रिटिश भारत में ट्रांसफर नहीं किया गया था।'