असम के लखीमपुर जिले के सेंदाहाखोवा गांव में 128 कटाव प्रभावित परिवारों की आजीविका बढ़ाने के लिए, कृषि और मधुमक्खी पालन को संयुक्त किया है। बता दें कि असम के एक गांव के रहने वाले किसान भुइयां ने लगभग 12 साल पहले इस नवीन तकनीक की शुरुआत की थी। स्थानीय लोगों की मदद से भुइयां पिछले आठ वर्षों से सौ हेक्टेयर भूमि में सरसों की खेती कर रहे हैं। यह भूमि वर्ष में लगभग आठ महीनों तक बाढ़ के पानी से घिरी रहती है। मधुमक्खी पालन के साथ सरसों की खेती करने से वे अपने उत्पादन में 20 प्रतिशत की वृद्धि करने में सफल रहे हैं।


नितुल भुयान ने बताया कि प्रत्येक बीघा जमीन में सरसों के पौधों के साथ मधुमक्खियों के छह बक्से रखे जाते हैं और एक सप्ताह में एक किलो शहद का उत्पादन एक बॉक्स में किया जाता है। मधुमक्खी पालन और सरसों की खेती एक दूसरे के पूरक हैं। भुइयां ने कहा कि हम रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और प्लास्टिक के उपयोग से बचने के लिए जैविक तरीके से शहद और सरसों का उत्पादन करते हैं। इन किसानों द्वारा गठित प्रगति प्रोडक्शन फार्म एंड मार्केटिंग ऑर्गनाइजेशन के महासचिव महेश्वर महंत ने कहा कि मधुमक्खियों द्वारा सरसों के फूलों में परागण से हर बीघा भूमि में तिलहन का उत्पादन 20 प्रतिशत बढ़ जाता है।


 महंत ने कहा कि उत्तर लखीमपुर में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट, खादी और ग्रामोदय विभाग और क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान स्टेशन (RARS) ने सांडाहाखोवा को मधुमक्खी गांव की स्थिति से जोड़ा है। RARS ने किसान उत्पादक संगठन की स्थिति के साथ प्रगति प्रोडक्शन फार्म और मार्केटिंग ऑर्गनाइज़ेशन को भी मान्यता दी। हालाँकि, इस गाँव के किसान सुबनसिरी नदी से आशंकित हैं जो हर साल अपनी कृषि भूमि को तेजी से नष्ट कर रही है। किसानों ने कहा कि अगर नदी से कटाव जारी रहा तो वे डेढ़ साल के भीतर अपने सरसों के खेत खो देंगे। लेकिन यह होने नहीं दिया जाएगा।