Assam के Darang district के Sipajhar गांव में पिछले हफ्ते जमीन खाली कराने के अभियान के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें दो लोगों की मौत हुई, जबकि कई और लोग घायल भी हुए। घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें लाठी लिए एक प्रदर्शनकारी को पुलिस की गोली से जान गंवाते भी देखा जा सकता है। इसी वीडियो में एक व्यक्ति द्वारा मृतक के शव को कुचलते भी देखा गया था। इसके बाद असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश दे दिए। 

इस मामले पर दो दिन पहले ही पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिक को बुलाया था। पाक विदेश मंत्रालय का आरोप था कि राज्य में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर पाकिस्तान की मौकापरस्ती की बात साफ है। लेकिन असम में यह कोई पहली बार नहीं था, जब जमीन विवाद को लेकर विवाद पैदा हुआ है। राज्य में पहले भी कब्जाई गईं सरकारी जमीन खाली कराने के दौरान जबरदस्त झड़प हो चुकी हैं।

दरअसल, सिपाझार में बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले मुस्लिम रहते हैं। वे जिन इलाकों में रहते हैं, आरोप है कि वहां अवैध तरीके से सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है। इसी साल जून में जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने क्षेत्र का दौरा किया था, तो उन्होंने स्थानीय समुदायों से वादा किया था कि वह उनकी कब्जाई गई जमीनों को वापस दिलाएंगे और यहां धौलपुर गांव में मौजूद शिव मंदिर में बाउंड्री वॉल का निर्माण होगा।

उधर, सरकार का कहना है कि इन कब्जों से जमीन खाली कराने का अभियान इसलिए है ताकि असम के बिना जमीन वाले स्थानीय समुदायों को कृषि योग्य जमीन मुहैया हो सके। इसके लिए राज्य सरकार ने बजट में 9.6 करोड़ रुपये कृषि परियोजना के लिए अलग से तय किए हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत खाली कराई गई सरकारी जमीन पर पौधे लगाए जाएंगे और यहां कृषि गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें स्थानीय युवा शामिल होंगे। कृषि विभाग के अनुरोध के तहत ही जिला प्रशासन ने कब्जाई जमीन को सामुदायिक कृषि भूमि घोषित कर दिया। 

जून में अवैध कब्जाइयों को हटाने के लिए प्रशासन ने शिव मंदिर के पास अभियान चलाया। सात परिवारों को हटाया भी गया। इसके बाद बीते सोमवार से गुरुवार तक भी बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। बता दें कि सिपाझार में 1200 से 1300 परिवारों पर आरोप है कि उन्होंने अवैध तरीके से 10 हजार बीघा से ज्यादा की सरकारी जमीन पर बस्ती बसा ली थी। इन्हें हटाने के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई। 

दावा किया जा रहा है कि असम में इस वक्त जिन लोगों को अवैध कब्जे वाली जमीन से हटाया जा रहा है, उनमें बड़ी संख्या बंगाली बोलने वाले मुस्लिमों की है। ये लोग ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर हैं। सरकार का कहना है कि इन लोगों ने जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था, लेकिन यहां रहने वाले लोगों का दावा है कि वो बाड़पेटा और गोलपारा जैसे जिलों में नदी के कटान की वजह से अपना घर खोने के बाद यहां आ गए थे। इन लोगों का कहना है कि वे पिछले 40 सालों से यहां रह रहे हैं। कुछ लोगों का तो यहां तक दावा है कि उन्होंने स्थानीयों से जमीन खरीदी थी, लेकिन ज्यादातर लेन-देन बिना किसी दस्तावेजी कार्रवाई के हुए, इसलिए उनकी वैधता पर सवाल उठ गए।