असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि मिजोरम के साथ सीमा विवाद फिलहाल सुलझ गया है और अब कहीं कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या यह इतना आसान है? अगर असम मिजोरम सीमा पर विवाद को सुलझाना इतना आसान होता तो इतने लंबे अरसे से यह विवाद जारी नहीं रहता और इतना हिंसक नहीं होता। असम के मुख्यमंत्री ने पूर्वोत्तर राज्यों के बीच दशकों से जारी सीमा विवाद के लिए पहले की कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। इस बीच, मेघालय में सीमावर्ती इलाके के लोगों ने असम पर राज्य की कुछ जमीन पर नए सिरे से कब्जा करने का आरोप लगाया है।

दूसरी ओर, असम-मिजोरम सीमा विवाद के दौरान हुई हिंसा में छह पुलिसवालों समेत सात लोगों की मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग के साथ गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। अदालत 23 अगस्त को इस पर सुनवाई करेगी।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इस सप्ताह दिल्ली दौरे पर थे जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। सरमा ने कहा है कि दोनों राज्य सरकारें अब एक-दूसरे से बात करते हुए सीमा पर स्थायी शांति बहाल करने की दिशा में काम कर रही हैं। उनका दावा है कि मिजोरम से लगी सीमा पर शांति बहाल हो गई है। सरकार उस एडवाइजरी को भी वापस ले लेगी जिसमें राज्य के लोगों से मिजोरम के दौरे पर नहीं जाने को कहा गया था।

लेकिन यह शांति कितनी स्थायी होगी? इस सवाल पर उनका कहना था कि यह समस्या बहुत पुरानी है और इसके स्थायी समाधान में कुछ समय तो लगेगा ही। मुख्यमंत्री ने कहा कि असम का किसी भी जमीन पर कोई दावा नहीं है और वह नहीं चाहते कि कोई अपनी जमीन छोड़े। जमीन के छोटे-से टुकड़े के लिए आपसी रिश्तों को बिगाड़ना बुद्धिमानी नहीं है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने पूर्वोत्तर के सीमा विवाद के लिए पहले की कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि साजिश या सोची-समझी रणनीति के तहत अलग राज्यों के गठन के समय असम की सीमाओं को ठीक से चिन्हित नहीं किया गया। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सरमा के आरोप का समर्थन किया है। शाह ने कहा, "जब मेघालय, नागालैंड और मिजोरम को अलग राज्य का दर्जा दिया गया था तब असम को कोई आपत्ति नहीं थी। उस समय अगर और दस किमी दे दिया जाता तो कोई समस्या ही नहीं होती। लेकिन इसे साजिश के तहत मुद्दा बनाए रखा गया ताकि पूर्वोत्तर राज्य हमेशा इस पर एक-दूसरे से लड़ते रहें।"

असम के मुख्यमंत्री का कहना है कि दोनों राज्यों की सरकार अब सीमा पर शांति बहाली और उसे बनाए रखने की दिशा में काम कर रही हैं। हिमंत कहते हैं, "इलाके के राज्यों के बीच दशकों पुराने सीमा विवाद का एक दिन में समाधान नहीं हो सकता क्योंकि यह एक बेहद जटिल मुद्दा है।" असम सरकार की दलील है कि वह संवैधानिक सीमा का मुद्दा उठा रही है जबकि मिजोरम सरकार ऐतिहासिक सीमा की दलील दे रही है। अलग राज्यों के गठन के समय ही इस मुद्दे को स्थायी समाधान किया जाना चाहिए था। लेकिन तब जानबूझकर ऐसा नहीं किया गया।

यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि पड़ोसी मेघालय के साथ भी असम का करीब पचास साल से सीमा विवाद चल रहा है। मेघालय के री-भोई जिले के लोगों ने असम पर हाल में नए इलाकों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया है। असम सरकार ने इसी सप्ताह सीमा पर स्थित पिलंगकाटा गांव का सर्वेक्षण कर उसे असम का हिस्सा बताया। इससे गांव वालों में भारी नाराजगी है। उनलोगों ने असम सरकार का दावा खारिज कर दिया है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भले मिजोरम के साथ सीमा विवाद के तात्कालिक तौर पर सुलझने और सीमा पर शांति बहाल होने का दावा करें, जमीनी हकीकत अलग है। असम-मिजोरम सीमा पर अब भी दोनों ओर के लोग भारी तनाव में दिन गुजार रहे हैं। एहतियात के तौर पर सीमा पर सीआरपीएफ जवानों की तैनाती कर दी गई है। लेकिन सवाल उठने लगा है कि यह शांति कहीं किसी बड़े तूफान का संकेत तो नहीं है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि हिमंत बिस्वा सरमा हाल की हिंसा के बाद भड़के तनाव के संदर्भ में ही शांति का जिक्र कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक नरेन नाथ डेका कहते हैं, "अगर यह इतना आसान होता तो सीमा पर लंबे अरसे से हिंसक घटनाओं का सिलसिला जारी नहीं रहता। इस मामले में इतनी पेचीदगियां हैं जिनको सुलझाना आसान नहीं है। मिजोरम अपना दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।" उनका कहना है कि केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए किसी आयोग के जरिए पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना जरूरी है। लेकिन यह काफी लंबी प्रक्रिया है। डेका के मुताबिक पहले भी मेघालय के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया था। लेकिन उनकी सिफारिशें फाइलों में धूल चाट रही हैं।