गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कोरोना संक्रमण के चलते असम की जेलों में बंद विदेशी नागरिकों की रिहाई की शर्तो में ढील देकर उन्हें जल्द रिहा करने का फैसला किया है। ये वे विदेशी नागरिक हैं, जो घुसपैठ करके प्रदेश में घुसे और उन्हें जांच और सुनवाई के बाद विदेशी घुसपैठिया करार दिया गया। जेल में बंद इन विदेशियों को फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने विदेशी घुसपैठिया करार दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि जो विदेशी कैदी अपने कारावास के दो साल पूरे कर चुके हैं। उन्हें पांच हजार रुपये के निजी मुचलके पर दो लोगों की गारंटी लेते हुए रिहा कर देश की सीमा पर छोड़ा जाए। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस मानस रंजन पाठक की पीठ ने यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आलोक में दिया है। पीठ ने यह आदेश विदेशी घोषित किए गए समसुल हक की याचिका पर सुनवाई करने के बाद दिया है।

याचिकाकर्ता हक के कारावास के दो साल 13 मई को पूरे हो चुके हैं। इसलिए उसे आदेश का लाभ मिलेगा। पीठ ने कहा है कि आदेश की प्रति सभी सीमावर्ती जिलों के पुलिस प्रमुखों, जेल अधीक्षकों और अन्य उच्च अधिकारियों को भेजी जाए। जिससे वहां की जेलों में बंद दो साल की सजा पूरी कर चुके विदेशी बंदियों को रिहा किया जा सके। आदेश में कहा गया है कि अगर किसी बंदी के पक्ष में गारंटी देने वाले दो स्थानीय लोग न हों, तो उसे एक स्थानीय की गारंटी के आधार पर ही रिहा कर दिया जाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट अपने एक आदेश में असम के छह बंदी शिविरों में कैद विदेशी घुसपैठियों की रिहाई के लिए नियमों को आसान कर चुका है। 

उल्‍लेखनीय है कि अभी हाल ही में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन उल्फा-आइ (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम-इंडिपेंडेंट) ने कोरोना संक्रमण के चलते तीन माह के लिए एकतरफा संघर्ष विराम का एलान किया है। उल्फा की इस पहल से माना जा रहा है कि इससे शांति के लिए प्रदेश में अनुकूल माहौल बनेगा।