असम में ड्रग तस्करी के खिलाफ जारी अभियान से पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय अलगाववादी संगठनों की कमर टूट सकती है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय अलगाववादी संगठनों की फंडिंग का मुख्य स्त्रोत ड्रग्स, हथियार और मानव तस्करी है। असम और मिजोरम की सीमा पर खूनी झड़प के पीछे असली वजह असम के इस अभियान को भी माना जा रहा है और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसके खुलकर संकेत भी दिए थे।

सुरक्षा एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पिछले कई दशकों में असम, ड्रग्स की तस्करी के लिए म्यांमार, लाओस और थाइलैंड के गोल्डन ट्राइंगल के रास्ते भारत में भेजे जाने वाले ड्रग का मुख्य पड़ाव बन गया है। म्यांमार से मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के रास्ते ड्रग असम पहुंचाए जाते हैं और यहां से पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ भारत के अन्य इलाकों में भी इन्हें पहुंचाया जाता है। सीमा से सटे म्यांमार के इलाके में विभिन्न अलगाववादी गुटों के सक्रिय कैंप है, जो तस्करों के लिए मददगार साबित होते हैं। एक खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां आने वाले कुल ड्रग की 25 फीसद खपत पूर्वोत्तर राज्यों में होती है और 75 फीसद भारत के दूसरे भागों में पहुंचाया जाता है।

गौरतलब है कि, हिमंता बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद असम में तस्करों के खिलाफ युद्धस्तर पर अभियान शुरू किया गया है। अभियान की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस साल आठ अगस्त तक 1449 मामलों में 2418 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जबकि 2018 में 455 मामलों में 694 ड्रग तस्कर, 2019 में 826 मामलों में 1226 ड्रग तस्कर और 2020 में 980 मामले में 1652 ड्रग तस्कर गिरफ्तार किये गये थे। इसी तरह से 2018 के पूरे साल की तुलना में इस साल सात महीने में पांच गुना से अधिक हेरोइन, अफीम और अन्य मादक पदार्थ बरामद किये जा चुके हैं।

असम के विशेष पुलिस महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि असम सरकार ड्रग तस्करी पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए कृतसंकल्प है। यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। जाहिर है ड्रग तस्करों के खिलाफ इस अभियान से पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय अलगाववादी संगठनों में बेचैनी बहुत बढ़ गई है। मिजोरम के साथ सीमा विवाद के दौरान गोलियां बरसाकर असम पुलिस के पांच जवानों की हत्या के पीछे इन्हीं ड्रग तस्करों और अलगाववादियों को जिम्मेदार माना जा रहा है।