असम में एनआरसी लागू करने को लेकर असम सरकार और केंद्र के बीच चर्चा जारी है। इस सिलसिले में 20 सितंबर को देर शाम आनन फानन में दिल्ली पहुंचे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की चर्चा 2 घंटे तक चली। केंद्रीय गृहमंत्री के साथ इस बैठक में असम के मुख्यसचिव समेत कुछ महत्वपूर्ण अधिकारी भी शामिल हुए।

गृहमंत्री से बैठक के बाद असम के मुख्यमंत्री ने इशारा किया कि अन्य मुद्दों के अलावा एनआरसी पर चर्चा हुई। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल केंद्र और असम सरकार एक ही स्थिति में हैं और सुप्रीम कोर्ट में लंबित फैसले का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन में 19 लाख लोगों के नाम नहीं जुड़ पाने के बाद असम सरकार की ओर से राज्य के एनआरसी सयोजक ने कोर्ट से दुबारा करेक्शन की मांग की थी जिससे कुछ जेनुइन लोगों का नाम जुड़ सके। कोर्ट ने अबतक इस मसले पर कोई फैसला या व्यवस्था नहीं दी है।

सूत्रों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश आते ही एनआरसी को तेजी से कार्यान्वित करने का मुकम्मल रोड मैप असम सरकार ने बना रखा है। बीजेपी और असम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में अगस्त 2019 में सूबे में तैयार अंतिम एनआरसी सूची में बांग्लादेश से आकर असम में बसे हिन्दू आबादी की बड़ी संख्या का नाम नदारद है जो दो-दो पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं।

दरअसल, इसी साल मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में जारी बीजेपी के मेनिफेस्टो में ये घोषणा की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत असम में एनआरसी को लागू करेगी। असम में तैयार एनआरसी को कानूनी वैधता प्रदान के मामले पर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। इस वजह से लाखों लोगों का भविष्य अधर में लटका है। असम में तैयार एनआरसी को कानूनी वैधता प्रदान के लिए रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने अब तक कोई अधिसूचना जारी नहीं की है। लेकिन इस बीच असम के करीमगंज के एक न्यायाधिकरण ने एक व्यक्ति को भारतीय घोषित करते हुए पूर्व की एनआरसी को ही अंतिम सूची करार दिया है।  करीमगंज का के न्यायाधिकरण एक व्यक्ति की नागरिकता पर सुनवाई कर रहा था।  हाल में ही असम सरकार ने इस साल 4 सितंबर को एक आदेश जारी कर ऐसे न्यायाधिकरणों से एनआरसी पर कोई भी टिप्पणी नहीं करने की दरख्वास्त की है।