आयकर विभाग ने असम में डॉक्टरों और चिकित्सा सेवा से जुड़े अनेक समूहों पर छापेमारी और सर्वे किया। इस छापेमारी और सर्वे के दौरान करोड़ों रुपए की नकदी और 100 करोड़ रुपए के अघोषित लेनदेन का पता चला है। आयकर विभाग ने इस बाबत असम के विभिन्न स्थानों पर 29 जगहों पर छापेमारी की थी।

आयकर विभाग के एक आला अधिकारी ने बताया कि विभाग को सूचना मिली थी कि असम के गुवाहाटी नलबाड़ी और डिब्रूगढ़ में चिकित्सा सेवा से जुड़े अनेक लोग बड़े पैमाने पर कर चोरी कर रहे हैं। यहां तक कि उनके अस्पतालों नर्सिंग होम में जो लेन-देन की कैश बुक दिखाई जाती है उससे कहीं ज्यादा पैसा अघोषित लेनदेन के जरिए होता है। विभाग को यह भी पता चला कि इन अस्पतालों नर्सिंग होम चिकित्सा जांच केंद्र और फार्मास्यूटिकल व्यवसाय में लगे लोग काले धन को सफेद कर रहे हैं।

सूचना के आधार पर असम के 3 जिलों में 29 जगहों पर छापेमारी की गई। इस छापेमारी के दौरान यह पाया गया कि एक समूह आउट ऑफ बुक्स लेन-देन में संलग्न है और उसके यहां छापेमारी में कई दस्तावेज और नकद रसीद पर्ची बुक्स पाई गई जिनको की अकाउंट की किताबों में लिखा ही नहीं गया था। जांच के दौरान यह भी पाया गया कि इन लोगों द्वारा अपने चिकित्सा कार्य या फार्मा के कामों में भी शुद्ध लाभ बहुत कम दिखाया जा रहा था।

विभाग ने छापेमारी के दौरान एक संस्थान उसे ऐसी लगभग 50 करोड़ से ज्यादा के अवैध लेनदेन संबंधी दस्तावेजों को जब्त किया। आयकर विभाग के आला अधिकारी के मुताबिक असम के नलबाड़ी इलाके में मारे गए छापेमारी के दौरान लगभग पौने दो करोड़ रुपए की नकदी जप्त की गई। छापेमारी के दौरान यह पाया गया कि जो नगदी इस संस्थान के पास थी वह अधिकारिक तौर पर कहीं भी दिखाई नहीं गई थी। साथ ही बड़े पैमाने पर अचल संपत्तियों के दस्तावेज भी बरामद किए गए।

आयकर विभाग को जांच के दौरान यह पता भी चला कि अघोषित नगदी का ज्यादातर इस्तेमाल नए अस्पतालों के निर्माण नर्सिंग होम के पुनर्निर्माण और अघोषित संपत्ति की खरीद में किया गया। जांच के दौरान यह भी पाया गया कि एक संस्थान ने अघोषित लेन देन को अलग-अलग कागजों डायरियो में तो लिखा हुआ था लेकिन उन्हें कहीं भी अस्पताल के रिकॉर्ड में नहीं चढ़ाया गया था।

आयकर विभाग के आला अधिकारी के मुताबिक तमाम चिकित्सा संस्थान और इससे जुड़े लोग नियम कानूनों को ताक पर रखकर कर की चोरी कर रहे थे और अपने संस्थानों की अकाउंट बुक को में वास्तविक धनराशि को चढ़ा ही नहीं रहे थे। इन लोगों की आमदनी कई करोड़ रुपए में थी जबकि किताबों में उन्हें लाखों में दर्शाया जा रहा था।