कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में देश के कई नागरिकों ने आगे आ कर राहत कार्यों के लिए दान किया है। जहां कई सरकारी अधिकारियों, नेताओं और नागरिकों ने अपनी लाखों रुपए की बचाई हुई धनराशि गुप्त रूप से ही दान कर दी। वहीं असम के फॉरेन ट्रिब्यूनल्स के 12 सदस्यों ने राज्य सरकार के खजाने में 60,000 रुपए के दान का ऐलान तो किया, लेकिन इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा कि हमारा पैसा दिल्ली में तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लेने वालों, जिहादियों और जाहिलों पर खर्च न हो। 7 अप्रैल के इस पत्र को असम के स्वास्थ्य और वित्त मंत्री हिमंत बिस्व शर्मा के लिए लिखा गया है और इसमें कमलेश कुमार गुप्ता के हस्ताक्षर हैं, जो कि बक्सा जिले में फॉरेन ट्रिब्यूनल्स के सदस्य हैं। गुप्ता जो कि पूर्व में एडवोकेट और नोटरी रह चुके हैं से जब संडे एक्सप्रेस ने पत्र के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि यह पत्र उन्होंने ही लिखा है, लेकिन इसे वापस ले लिया गया और सरकार को नहीं भेजा। इसमें लिखी बातों पर गुप्ता ने कहा, 'पत्र में जो भी है, मैं उस पर आगे चर्चा नहीं करना चाहता।'

फॉरेन ट्रिब्यूनल्स के सदस्यों के इस पत्र में कहा गया था, 'हमारी सिर्फ एक ही प्रार्थना है कि यह मदद तब्लीगी जमात के उल्लंघनकर्ता सदस्यों को, जिहादियों को और जाहिलों को नहीं जानी चाहिए। कृपया मानवता को कोरोनावायरस संक्रमण के शिकंजे से बचाने के लिए हमारे दान को स्वीकार करें।' फॉरेन ट्रिब्यूनल्स ऐसे अर्ध न्यायिक निकाय हैं, जो फॉरेनर्स एक्ट 1946 के तहत किसी व्यक्ति के अवैध विदेशी नागरिक होने पर फैसला सुनाते हैं। असम में हुए नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) के तहत जिन 19 लाख लोगों को देश का नागरिक नहीं माना गया है, उनकी नागरिकता की सुनवाई भी फॉरेन ट्रिब्यूनल्स के सामने ही होनी है और इसके सदस्य ही लोगों की नागरिकता पर पर फैसला देंगे।

पत्र में जिन 12 लोगों के नाम हैं, उनमें से एक नाम पोम्पा चक्रवर्ती का है, जिन्होंने पिछले साल भारतीय सेना से रिटायर सुबेदार मोहम्मद सनाउल्लाह को विदेशी करार दिया था। सनाउल्लाह को इसके बाद डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया था। हालांकि, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने बाद में उन्हें जमानत दे दी। 30 साल सेना में सेवा दे चुके सनाउल्लाह की फॉरेन ट्रिब्यूनल के खिलाफ अपील अभी कोर्ट में पेंडिंग है। पत्र में जिन 12 लोगों के नाम दिए गए हैं उनमें से एक ने नाम उजागर न किए जाने की शर्त पर बताया कि ट्रिब्यूनल के सदस्यों ने एक दिन की सैलरी कोरोनावायरस राहत कोष में देने का फैसला किया था। लेकिन गुप्ता ने पत्र को उनके साथ साझा नहीं किया। यह विवाद उठने के बाद ही था कि गुप्ता ने पत्र लिखने की बात स्वीकारी। यह हमारे विचार नहीं दर्शाता है। एक अन्य दानकर्ता ने बताया कि ट्रिब्यूनल के कुछ सदस्यों ने पत्र पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद ही इसे वापस ले लिया गया।