असम समझौते की धारा छह संबंधी उच्च स्तरीय समिति के हिस्सा रहे आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने मंगलवार को गोपनीय रिपोर्ट जारी कर दी और कहा कि जनता को इसके बारे में जानने का अधिकार है। आसू और समिति के एक अन्य सदस्य एवं अरुणाचल प्रदेश के महाधिवक्ता निलय दत्ता ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और कहा कि वे इसे केवल इसलिए जारी कर रहे हैं क्योंकि 'सरकार सिर्फ हाथ पर हाथ रखकर बैठी है।'

आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य ने कहा, 'हमें रिपोर्ट सौंपे पांच महीने से अधिक समय हो गया है, लेकिन सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई है। लोग हमसे रोज पूछ रहे हैं उसका क्या हुआ। हमने आखिरकार इसे जारी करने का फैसला किया क्योंकि लोगों को जानने का अधिकार है।' धारा छह के अनुसार, असमिया लोगों की संस्कृति, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय, जो भी उपयुक्त हों किये जाएंगे। समझौते पर हस्ताक्षर होने बाद से विवाद की जड़ असमिया लोगों की परिभाषा है, जिसका समाधान समिति ने करने की कोशिश की। 

गत 25 फरवरी को न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी के शर्मा की अध्यक्षता में धारा छह के कार्यान्वयन पर उच्च स्तरीय समिति ने रिपोर्ट मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को सौंपी थी ताकि इसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपा जा सके। समिति के अध्यक्ष ने पूरे राज्य मंत्रिमंडल, शीर्ष सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी। भट्टाचार्य ने कहा, 'हमें नहीं पता कि रिपोर्ट कहां है। क्या यह मुख्यमंत्री की अलमारी में है या कहीं और है? क्या इसे दिल्ली भेजा गया है? रिपोर्ट को इस तरह से नजरअंदाज करना स्वीकार्य नहीं है।' 

रिपोर्ट में असम समझौते को अक्षरश: लागू करने की बात की गई है और सरकार से भारत-बांग्लादेश सीमा को सील करने के लिए त्वरित उपाय करने के लिए कहा गया है। इसमें राज्य से संसद की सीटों में 80-100 प्रतिशत आरक्षण का सुझाव तथा असम में उच्च सदन बनाने की सिफारिश की गई है।यह पूछे जाने पर कि क्या रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का कोई कानूनी प्रभाव होगा, वरिष्ठ अधिवक्ता दत्ता ने कहा कि इसका कोई प्रभाव नहीं होगा।केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले साल जनवरी में सेवानिवृत्त केंद्रीय सचिव एम पी बेजबरुआ की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, लेकिन नौ सदस्यों में से छह ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया। उसके बाद 16 जुलाई, 2019 को समिति का पुनर्गठन किया गया, जिसमें न्यायमूर्ति(सेवानिवृत्त) शर्मा अध्यक्ष बनाए गए और 14 अन्य सदस्य रखे गए।