असम की बीजेपी सरकार ने राज्य में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून (​AFSPA) की मियाद को बढ़ाते हुए इसे और छह महीने के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया है। राज्य सरकार ने शनिवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में इस बात की जानकारी दी है। 28 अगस्त से शुरू होकर ये कानून अगले छह महीने तक लागू रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से इस कानून की समयसीमा बढ़ाने के कारणों को लेकर कुछ भी नहीं कहा गया है।

राज्य सरकार के आधिकारिक बयान के मुताबिक, "असम सरकार ने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून (​AFSPA), 1958 के सेक्शन 3 के तहत मिलने वाली ताकत का इस्तेमाल करते हुए असम को अगले छह महीने के लिए 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया है। 28-08-2021 से लेकर अगले छह महीने तक यहां AFSPA कानून लागू रहेगा।"

राज्य के गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, AFSPA के इस एंटी टेरर एक्ट जो आर्मी और अर्धसैनिक बलों को विशेष ताकत प्रदान करता है को नवंबर 1990 में पहली बार असम में लागू किया गया था। तब से हर छह महीने के बाद इसकी मियाद को आगे बढ़ाया जाता रहा है। सुरक्षा एजेंसी राज्य के हालात का रिव्यू करती हैं जिसके बाद ये निर्णय लिया जाता है।   

उन्होंने बताया, "आर्मी, केंद्र के अर्धसैनिक बल और इंटेलिजेन्स एजेंसी के साथ असम पुलिस राज्य के हालात को करीब से मॉनिटर करते हैं। जिसके बाद सभी की रजामंदी से इस कानून को लागू करने को लेकर फैसला किया जाता है।"

क्या है AFSPA

AFSPA कानून के अंतर्गत सुरक्षा बलों को कहीं भी रेड डालने, अभियान चलाने और किसी को भी पहले से नोटिस दिए बिना और बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार रहता है। असम के अलावा समूचे नागालैंड राज्य,अरुणाचल प्रदेश के कुछ जिलों और मणिपुर के ज्यादातर इलाकों को भी AFSPA कानून लागू कर अशांत क्षेत्र घोषित किया गया है। सुरक्षा एजेंसी और वरिष्ठ अधिकारी हर छह महीने के बाद हालात को रिव्यू करते हैं और इसे आगे लागू करना है या नहीं ये फैसला करते हैं।

कई राजनैतिक दल, सामाजिक संगठन, सिविल सोसायटी ग्रुप और एक्टिविस्ट नॉर्थ ईस्ट के राज्यों से इस AFSPA कानून को हटाने की मांग करते आ रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट के राज्यों  में से त्रिपुरा इकलौता ऐसा राज्य है जहां मई 2015 में इस AFSPA कानून को हटाने का फैसला किया गया था। त्रिपुरा में आतंकी गतिविधियों में कमी के मद्देनजर उस समय की लेफ्ट फ़्रंट गवर्नमेंट की अगुवाई कर रहे मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने राज्य से इस कानून को हटाने का फैसला किया था।